आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) द्वारा दी जाने वाली गलत और भ्रामक जानकारी (Hallucinations) को रोकने के लिए UN और Google ने मिलकर 'UN System Data Commons' लॉन्च किया है। यह पहल वैश्विक आंकड़ों को AI के लिए अधिक भरोसेमंद और सटीक बनाएगी।
डेटा की विश्वसनीयता पर जोर
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मॉडल अक्सर तथ्यों को गलत तरीके से पेश करते हैं या काल्पनिक जवाब (Hallucinations) देते हैं, जो आर्थिक और विकास संबंधी रिसर्च के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। इस समस्या से निपटने के लिए, संयुक्त राष्ट्र (UN) ने Google के साथ मिलकर 'UN System Data Commons' पेश किया है। यह नया प्लेटफॉर्म पुराने UNData पोर्टल की जगह लेगा और आधिकारिक वैश्विक आंकड़ों को AI सिस्टम के लिए एक्सेस करने योग्य बनाएगा।
कैसे काम करेगा यह सिस्टम?
यह पहल Google की ओपन-सोर्स 'Data Commons' तकनीक पर आधारित है। इसकी सबसे बड़ी खूबी 'Model Context Protocol' (MCP) है, जो AI मॉडल को सीधे आधिकारिक डेटासेट से जुड़ने की सुविधा देता है। इससे यूजर किसी भी आंकड़े की सत्यता की जांच सीधे UN के मूल स्रोत से कर सकेंगे।
आंकड़े और चुनौतियां
UNICEF के एक विश्लेषण में सामने आया कि प्रमुख लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स की सटीकता दर महज 21.2% ही रही, जब उनसे वैश्विक विकास संकेतकों (global development indicators) के बारे में पूछा गया। इस जोखिम को देखते हुए, UN ने 2027 तक अपने करीब 80% डेटा को इस नए प्लेटफॉर्म पर माइग्रेट करने का लक्ष्य रखा है। Google.org ने इस प्रोजेक्ट के लिए $2 मिलियन की फंडिंग और तकनीकी सहायता प्रदान की है।
निवेशकों और टेक सेक्टर के लिए संकेत
यह कदम 'Trusted AI' की ओर बढ़ते रुझान को दर्शाता है। भारतीय IT कंपनियां, जो ग्लोबल क्लाइंट्स के लिए जनरेटिव AI समाधानों पर भारी निवेश कर रही हैं, इस तरह के बदलावों पर बारीकी से नजर रखेंगी। हालांकि, अधिकारियों का यह भी मानना है कि AI मानव विश्लेषण का विकल्प नहीं है, इसलिए अहम फैसलों के लिए मानवीय देखरेख अनिवार्य रहेगी।
