US सरकार ने PERM ग्रीन कार्ड प्रोग्राम के तहत 8 प्रमुख टेक कंपनियों को सस्पेंड कर दिया है। इस फैसले के बाद से टेक सेक्टर में अनिश्चितता का माहौल है और कंपनियों पर अब डोमेस्टिक हायरिंग या ऑफशोरिंग बढ़ाने का दबाव बढ़ गया है।
टेक सेक्टर के लिए एक बड़ी चुनौती सामने आई है। 8 अक्टूबर, 2026 को अमेरिकी श्रम विभाग (U.S. Department of Labor) ने 8 प्रमुख टेक्नोलॉजी कंपनियों को परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन (PERM) प्रोग्राम से सस्पेंड कर दिया है। इस कदम के बाद ये कंपनियां अब नई या पेंडिंग ग्रीन कार्ड एप्लीकेशन प्रोसेस नहीं कर सकेंगी, जिससे टेक कर्मचारियों के बीच काफी चिंता है और Blind जैसे प्लेटफॉर्म्स पर बहस तेज हो गई है।
कौन सी कंपनियां हैं निशाने पर?
इस बैन की लिस्ट में भारतीय IT दिग्गज जैसे TCS, Infosys, Wipro, HCL के अलावा Cognizant, Capgemini, Microsoft और Adobe भी शामिल हैं। हालांकि Amazon अभी इस लिस्ट में नहीं है, लेकिन वहां के वर्कफोर्स मॉडल पर भी अब बारीकी से नजर रखी जा रही है। यह सब H-1B वीजा के दुरुपयोग को रोकने और स्थानीय रोजगार को बढ़ावा देने के अमेरिकी प्रशासन के कड़े रुख का हिस्सा है।
निवेशकों के लिए जोखिम (Investor Risks)
यह बदलाव सीधे तौर पर कंपनियों के फाइनेंशियल मॉडल को प्रभावित कर सकता है:
- लेबर कॉस्ट में बढ़ोतरी: अगर कंपनियां अमेरिका में ही लोकल हायरिंग के लिए मजबूर होती हैं, तो उनका वेतन बिल (Wage bill) काफी बढ़ सकता है, जिसका सीधा असर आने वाली तिमाहियों में Profit Margins पर दिखेगा।
- ऑफशोरिंग की चुनौती: यदि कंपनियां लागत बचाने के लिए काम को बाहर शिफ्ट करती हैं, तो उन्हें ऑपरेशनल दिक्कतों और भू-राजनीतिक (Geopolitical) जोखिमों का सामना करना पड़ सकता है।
निवेशकों को अब इन कंपनियों की आने वाली अर्निंग रिपोर्ट्स और मैनेजमेंट कमेंट्री पर नजर रखनी चाहिए कि वे कैसे इस बदलाव को हैंडल कर रही हैं। क्या ये कंपनियां अपनी सर्विस लेवल को बरकरार रख पाएंगी या फिर भर्ती खर्च में बड़ी बढ़ोतरी देखने को मिलेगी, यही सबसे बड़ा सवाल बना हुआ है।
