Tata Sons के चेयरमैन N. Chandrasekaran ने ग्रुप के बड़े सेमीकंडक्टर निवेशों का बचाव किया है। यह कदम ऐसे समय आया है जब टाटा समूह के भीतर भारी कैपिटल खर्च और प्रॉफिटेबिलिटी को लेकर आपसी मतभेद बढ़ रहे हैं।
Tata Sons के चेयरमैन N. Chandrasekaran ने सेमीकंडक्टर और बैटरी मैन्युफैक्चरिंग में समूह के आक्रामक विस्तार पर उठ रहे सवालों का खुलकर जवाब दिया है। नई दिल्ली में ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम में उन्होंने कहा कि ये प्रोजेक्ट्स भारत की औद्योगिक आत्मनिर्भरता के लिए नींव का पत्थर साबित होंगे, ठीक वैसे ही जैसे अतीत में टाटा का स्टील और पावर सेक्टर में कदम रहा था।
इंटरनल मतभेद की आग
यह बचाव ऐसे वक्त पर आया है जब टाटा ग्रुप के भीतर ही तनातनी साफ दिख रही है। प्रमोटर 'Tata Trusts' और 'Tata Sons' के बीच निवेश की गति और प्रॉफिटेबिलिटी के टाइमलाइन को लेकर खींचतान चल रही है। नोएल टाटा के नेतृत्व वाली Tata Trusts ने भारी खर्च पर लगाम लगाने और अधिक कड़े वित्तीय अनुशासन की मांग की है, जबकि Tata Sons एक लंबे विजन के साथ काम कर रही है।
बढ़ता कर्ज और भारी नुकसान
इस महत्वाकांक्षी योजना का असर कंपनी की बैलेंस शीट पर दिखने लगा है। Tata Electronics का कर्ज फाइनेंशियल ईयर 2026 में 71% बढ़कर ₹11,718 करोड़ के स्तर पर पहुंच गया है। कंपनी ने दो बड़े प्रोजेक्ट्स पर मोटा पैसा झोंका है: गुजरात के ढोलेरा में ₹91,000 करोड़ का फैब्रिकेशन प्लांट और असम में ₹27,000 करोड़ का असेंबली फैसिलिटी। इसी दौरान, कंपनी का नेट लॉस भी बढ़कर ₹1,611 करोड़ हो गया है, जो इस बिजनेस के 'हाई कैश बर्न' मॉडल को दर्शाता है।
भविष्य की राह
Chandrasekaran ने स्पष्ट किया है कि वे केवल मुनाफे के पीछे नहीं भाग रहे, बल्कि लॉन्ग-टर्म औद्योगिक चक्र को देख रहे हैं। हालांकि, निवेशकों के लिए चिंता का विषय प्रोजेक्ट्स का समय पर पूरा होना और वित्तीय स्थिरता है। ढोलेरा और असम प्लांट्स की कमीशनिंग और वहां से होने वाली कमाई समूह के भविष्य के लिए बेहद अहम होगी। फिलहाल बाजार की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि टाटा के दिग्गज बोर्ड रूम की यह कलह किस तरह सुलझती है और भविष्य का रोडमैप क्या होता है।
