टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन ने सेमीकंडक्टर सेक्टर में निवेश को लेकर इंडस्ट्री को सचेत किया है। उन्होंने कहा कि बिना डिमांड सुनिश्चित किए केवल टेक्नोलॉजी के पीछे भागना जोखिम भरा है, जबकि टाटा ग्रुप खुद **₹1.18 लाख करोड़** के प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहा है।
टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन ने भारत के सेमीकंडक्टर मिशन को लेकर एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दिया है। ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम में बोलते हुए उन्होंने साफ किया कि भारत के पास टैलेंट और स्केल जरूर है, लेकिन हाई-एंड मैन्युफैक्चरिंग प्रोसेस (जैसे कि 2-नैनोमीटर चिप्स) में उतरने से पहले यह जानना जरूरी है कि ग्राहक कौन है और बाजार की मांग क्या है।
टाटा का ₹1.18 लाख करोड़ वाला मास्टर प्लान
जहां एक तरफ चंद्रशेखरन सावधानी बरतने की बात कर रहे हैं, वहीं टाटा ग्रुप खुद देश में सेमीकंडक्टर ईकोसिस्टम बनाने में सबसे आगे है। ग्रुप गुजरात के ढोलेरा में ₹91,000 करोड़ का फैब्रिकेशन प्लांट लगा रहा है, जिसमें ताइवान की Powerchip (PSMC) और ASML का सहयोग है। इस प्लांट की क्षमता को 32,000 से बढ़ाकर 70,000 वेफर्स प्रति माह करने की मंजूरी मिल चुकी है।
इसके अलावा, असम के जागीरोड में ₹27,000 करोड़ की लागत से असेंबली और टेस्टिंग प्लांट तैयार किया जा रहा है, जहाँ प्रतिदिन 4.8 करोड़ चिप्स को प्रोसेस करने की क्षमता होगी। ग्रुप का फोकस केवल हाई-एंड फैब्रिकेशन पर नहीं, बल्कि टेस्टिंग और असेंबली के जरिए एक मजबूत और सस्टेनेबल सप्लाई चेन बनाने पर है।
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
निवेशकों को यह समझना होगा कि सेमीकंडक्टर सेक्टर में 'कैपिटल एक्सपेंडिचर' यानी शुरुआत में भारी खर्च की जरूरत होती है। मुनाफा आने में समय लगता है और तकनीक के तेजी से बदलने का जोखिम हमेशा बना रहता है। टाटा का जोर इस बात पर है कि बड़े निवेश के बदले आने वाले कैश फ्लो (Cash Flow) को ट्रैक करना जरूरी है। अब टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स की नजर लॉन्ग-टर्म परचेज एग्रीमेंट्स (Purchase Agreements) हासिल करने पर होगी, ताकि इन विशाल निवेशों को सही ठहराया जा सके।
