तमिलनाडु खुद को एक प्रमुख डेटा सेंटर डेस्टिनेशन के रूप में स्थापित कर रहा है। राज्य रिन्यूएबल एनर्जी और बेहतरीन सबसी कनेक्टिविटी का फायदा उठा रहा है। वर्तमान में चेन्नई के पास भारत की **21%** डेटा सेंटर क्षमता है, जो **2030** तक **6.5 GW** के राष्ट्रीय लक्ष्य को हासिल करने में बड़ी भूमिका निभाएगा।
मुंबई और बेंगलुरु के बाद अब तमिलनाडु डेटा सेंटर सेक्टर के नए कॉरिडोर के रूप में उभर रहा है। चेन्नई में भारत की 21% ऑपरेशनल क्षमता पहले से मौजूद है, लेकिन अब राज्य का विस्तार कोयम्बटूर, मदुरै, तिरुनेलवेली और तूतीकोरिन जैसे दक्षिणी जिलों तक हो रहा है। यहां बड़े हाइपरस्केल डेटा सेंटर और छोटे एज (Edge) फैसिलिटी के लिए काफी जमीन और सुविधाएं मौजूद हैं।
रिन्यूएबल एनर्जी का बड़ा फायदा
डेटा सेंटर इंडस्ट्री के लिए बिजली सबसे बड़ी चुनौती है, खासकर जब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) वर्कलोड की बात हो। आधुनिक डेटा सेंटर्स के रैक को 30-50 kW बिजली की जरूरत होती है। तमिलनाडु का विंड और सोलर एनर्जी में दबदबा ऑपरेटरों को एक बड़ा एडवांटेज देता है। रिन्यूएबल एनर्जी जोन के पास प्लांट लगाने से कंपनियां न केवल लागत कम कर सकती हैं, बल्कि ग्लोबल क्लाइंट्स की ग्रीन एनर्जी डिमांड को भी आसानी से पूरा कर सकती हैं।
डिस्ट्रीब्यूटेड नेटवर्क मॉडल
AdaniConneX, Yotta, STT Global Data Centres और Nxtra जैसी कंपनियां अब डिस्ट्रीब्यूटेड मॉडल अपना रही हैं। इसमें चेन्नई के पास एक बड़ा टियर-4 हाइपरस्केल सेंटर मुख्य प्रोसेसिंग करेगा, जबकि कोयम्बटूर और मदुरै जैसे शहरों में 10-20 MW के छोटे एज सेंटर होंगे। इससे 5G और एंटरप्राइज वर्कलोड की लेटेंसी (Latency) कम होगी।
रिस्क और इंफ्रास्ट्रक्चर की चुनौतियां
निवेशकों को कुछ चुनौतियों के प्रति भी सतर्क रहना चाहिए। डेटा सेंटर्स में पानी की खपत ज्यादा होती है, जो जल-संकट वाले इलाकों के लिए चिंता का विषय है। साथ ही, कूलिंग और सर्वर इक्विपमेंट के आयात पर निर्भरता प्रोजेक्ट की लागत को अस्थिर बना सकती है। भारत को 2030 तक 6.5 GW क्षमता के लिए करीब $80-100 बिलियन के निवेश की जरूरत है। ऐसे में ऑपरेटरों की लंबी अवधि की सफलता जमीन और बिजली से जुड़ी लॉजिस्टिक्स को मैनेज करने की क्षमता पर निर्भर करेगी।
