TCS, HCLTech और Cognizant ने AI पर कसा नकेल, नई 'पुलिसिंग' तकनीक से जोखिम कम करने की तैयारी

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AuthorMehul Desai|Published at:
TCS, HCLTech और Cognizant ने AI पर कसा नकेल, नई 'पुलिसिंग' तकनीक से जोखिम कम करने की तैयारी

बदलते दौर में भारतीय IT कंपनियां अब ऑटोनॉमस AI एजेंट्स पर लगाम लगाने के लिए नए सॉफ्टवेयर लेकर आई हैं। डेटा लीक और AI की मनमानी को रोकने वाली यह पहल इन कंपनियों को हाई-वैल्यू सर्विस की तरफ ले जा रही है, जो निवेशकों के लिए मार्जिन के लिहाज से अहम हो सकती है।

भारतीय IT सर्विस प्रोवाइडर्स अब ग्लोबल कंपनियों की एक बड़ी चिंता—ऑटोनॉमस AI एजेंट्स—के समाधान की तरफ बढ़ रहे हैं। ये डिजिटल वर्कर बिना मानवीय हस्तक्षेप के कोडिंग और कस्टमर सर्विस जैसे काम करने में सक्षम हैं, लेकिन इनसे डेटा लीक और गलत बर्ताव का खतरा बढ़ गया है। इसे देखते हुए दिग्गज IT कंपनियां अब ऐसी सॉफ्टवेयर टेक्नोलॉजी पर काम कर रही हैं जो इन AI एजेंट्स पर नजर रख सकें और उन्हें नियंत्रित कर सकें।

AI गवर्नेंस की ओर बढ़ता कदम

अब तक IT कंपनियां क्लाइंट्स को AI लागू करने में मदद करती थीं, लेकिन अब मॉडल 'गवर्नेंस' और 'ऑर्केस्ट्रेशन' की ओर शिफ्ट हो रहा है। कंपनियां ऐसे गार्डरेल्स बना रही हैं जो यह सुनिश्चित करेंगे कि AI एजेंट कंपनी की पॉलिसी के दायरे में ही काम करें। यह बदलाव महत्वपूर्ण है क्योंकि IT कंपनियां अब सिर्फ लेबर प्रोवाइडर नहीं, बल्कि इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी और प्रोप्राइटरी सॉफ्टवेयर वाली कंपनियां बन रही हैं।

प्रमुख खिलाड़ियों की रणनीति

इस मार्केट को पकड़ने के लिए हर कंपनी ने अलग दांव चला है। Tata Consultancy Services (TCS) एक 'एजेंटिक कंट्रोल प्लेन' बना रही है जो इन डिजिटल वर्कर्स के पूरे लाइफसाइकिल को मैनेज करेगा। वहीं, Cognizant ने 'AI Nexus' प्लेटफॉर्म लॉन्च किया है, जो हर AI एजेंट को एक यूनिक ID और परमिशन सेटिंग्स देता है ताकि रियल टाइम में उनकी ऑडिटिंग की जा सके।

HCLTech ने इसके लिए अधिग्रहण (Acquisition) का रास्ता चुना है। कंपनी ने क्रोएशिया की Robotiq.ai को खरीदा है, ताकि AI एजेंट्स को एंटरप्राइज सॉफ्टवेयर के साथ बेहतर तरीके से जोड़ा जा सके और कामकाज में आने वाली किसी भी अव्यवस्था को रोका जा सके।

निवेशकों के लिए क्या हैं संकेत?

निवेशकों के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह बदलाव प्रॉफिट मार्जिन को बढ़ाएगा? ट्रेडिशनल IT सेवाओं में भारी प्राइस वॉर होता है, लेकिन प्रोप्राइटरी सॉफ्टवेयर और गवर्नेंस प्लेटफॉर्म्स के लिए कंपनियां ज्यादा प्रीमियम चार्ज कर सकती हैं और लंबे कॉन्ट्रैक्ट्स हासिल कर सकती हैं।

हालांकि, चुनौतियां भी कम नहीं हैं। क्लाइंट्स की एडॉप्शन रेट और इन प्लेटफॉर्म्स के डेवलपमेंट पर होने वाला कैपिटल खर्च अभी देखना बाकी है। साथ ही, ग्लोबल लेवल पर AI को लेकर बढ़ती रेगुलेटरी सख्ती भी एक जोखिम बनी हुई है। आने वाले क्वार्टर्स में यह देखना दिलचस्प होगा कि इन नई गवर्नेंस सेवाओं का रेवेन्यू में कितना योगदान रहता है और ये कंपनियां मार्केट में कितना बड़ा कॉम्पिटिटिव एडवांटेज हासिल कर पाती हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.