कॉलेज के छात्र अब अपनी पारंपरिक डिग्री के साथ EdTech सर्टिफिकेशन को प्राथमिकता दे रहे हैं ताकि वे AI-रेडी जॉब मार्केट के लिए तैयार हो सकें। Simplilearn और upGrad जैसे प्लेटफॉर्म्स पर जबरदस्त उछाल देखने को मिल रहा है।
पारंपरिक चार साल की कॉलेज डिग्री पर आज साख का संकट मंडरा रहा है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जिस रफ्तार से लेबर मार्केट को बदल रहा है, उसे देखते हुए छात्र अब यह मान रहे हैं कि यूनिवर्सिटी का सिलेबस टेक्नोलॉजी की तेज रफ्तार के साथ कदम नहीं मिला पा रहा है। यही वजह है कि छात्र अब तेजी से EdTech प्लेटफॉर्म्स की ओर रुख कर रहे हैं ताकि वे नई नौकरियां पा सकें।
EdTech का बढ़ता दबदबा
इन स्पेशलाइज्ड प्रोग्राम्स की डिमांड आसमान छू रही है। Simplilearn ने सितंबर 2026 तक अपने कोर्सेज की एंटरप्राइज-लेवल डिमांड में 250% साल-दर-साल की वृद्धि दर्ज की है। वहीं, अपग्रेड (upGrad) और IIT खड़गपुर की पार्टनरशिप में चल रहे एग्जीक्यूटिव AI प्रोग्राम्स में भी तिमाही-दर-तिमाही 3 गुना नामांकन (enrollment) देखा गया है। वैश्विक स्तर पर भी रुझान ऐसे ही हैं; 2025 में अमेरिकी यूनिवर्सिटीज में कंप्यूटर साइंस में दाखिले 8% से ज्यादा गिर गए हैं, जो यह साबित करता है कि छात्र अब अपने समय और पैसे के निवेश को लेकर ज्यादा सतर्क हो गए हैं।
क्यों बढ़ रहा है यह गैप?
क्लासरूम थ्योरी और इंडस्ट्री की हकीकत के बीच की खाई बहुत बड़ी हो गई है। फॉर्मल एजुकेशन बुनियादी ज्ञान पर केंद्रित है, जबकि आज का जॉब मार्केट AI टूल्स, डेटा एनालिटिक्स और ऑटोमेशन की सीधी जानकारी मांगता है। डेटा बताता है कि 51% छात्र YouTube और 48% छात्र खुद एक्सपेरिमेंट करके AI सीख रहे हैं, जबकि केवल 25% छात्र ही यूनिवर्सिटी के जरिए ये स्किल्स हासिल कर पा रहे हैं।
भविष्य की चुनौती
इस बदलाव के साथ ही EdTech कंपनियां अब अपने मॉडल को रिटेल से हटाकर इंस्टीट्यूशनल पार्टनरशिप की तरफ ले जा रही हैं। Coursera जैसे प्लेटफॉर्म्स यूनिवर्सिटीज के साथ मिलकर कैंपस में ही सर्टिफाइड मॉड्यूल पेश कर रहे हैं। हालांकि, निवेशकों और छात्रों को इस बात पर नजर रखनी होगी कि क्या इन 'माइक्रो-क्रेडेंशियल्स' की वैल्यू लंबे समय तक बनी रहेगी, या मार्केट में बहुत ज्यादा सर्टिफिकेट्स आने से इनकी अहमियत कम हो जाएगी।
