Social Media Algorithms: क्या रेगुलेटरी दबाव से बदल जाएगा टेक कंपनियों का Revenue Model?

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AuthorAditya Rao|Published at:
Social Media Algorithms: क्या रेगुलेटरी दबाव से बदल जाएगा टेक कंपनियों का Revenue Model?

सोशल मीडिया कंपनियां अपनी विज्ञापन कमाई बढ़ाने के लिए एंगेजमेंट-ड्रिवेन एल्गोरिदम का इस्तेमाल करती हैं। हालांकि, दुनिया भर में यूजर सेफ्टी और लत लगाने वाले डिजाइन को लेकर बढ़ती कानूनी सख्ती कंपनियों के इस बिजनेस मॉडल के लिए खतरा बन सकती है।

डिजिटल एडवरटाइजिंग इंडस्ट्री का पूरा ताना-बाना एंगेजमेंट-बेस्ड एल्गोरिदम पर टिका है। 'इनफिनिट स्क्रॉलिंग' (Infinite Scrolling) जैसे फीचर्स का इस्तेमाल करके प्लेटफॉर्म यूजर्स को ऐप पर लंबे समय तक रोके रखते हैं। यह केवल एक डिजाइन का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह कंपनी का मुख्य रेवेन्यू ड्राइवर है। यूजर जितना ज्यादा समय ऐप पर बिताता है, कंपनियां उतने ही ज्यादा विज्ञापन दिखाती हैं, जिससे उनकी कमाई बढ़ती है।

एंगेजमेंट का बिजनेस लॉजिक

एल्गोरिदम को इस तरह तैयार किया गया है कि वे उन कंटेंट को प्रमोट करें जो यूजर्स में तीव्र भावनाएं जगाते हैं। विवादित या संवेदनशील कंटेंट अक्सर ज्यादा एंगेजमेंट जुटाते हैं। प्लेटफॉर्म्स के लिए 'टाइम-ऑन-ऐप' (Time-on-app) और 'डेली एक्टिव यूजर्स' (Daily Active Users) जैसे मेट्रिक्स ही उनकी वैल्यूएशन का आधार होते हैं।

रेगुलेटरी रिस्क और मार्केट पर असर

अब दुनिया भर के रेगुलेटर्स इस बिजनेस मॉडल के खिलाफ सख्त हो रहे हैं। कानून निर्माता अब केवल कंटेंट मॉडरेशन ही नहीं, बल्कि इन डिजिटल दिग्गजों के पूरे आर्किटेक्चर की जांच कर रहे हैं। अगर सरकारें एंगेजमेंट-रैंक फीड के खिलाफ सख्त नियम लाती हैं या यूजर्स को 'क्रोनोलॉजिकल फीड' (Chronological display) का विकल्प देती हैं, तो यह सीधे तौर पर प्लेटफॉर्म्स के मुनाफे को चोट पहुंचा सकता है।

यदि रेगुलेटर्स कामयाब होते हैं, तो प्लेटफॉर्म्स पर बिताए जाने वाले समय (Dwell time) में गिरावट आ सकती है, जिससे एड इंप्रेशन कम हो जाएंगे। साथ ही, कंपनियों को अपनी डेटा पारदर्शिता (Data transparency) सुधारने और फीड डिजाइन बदलने के लिए काफी खर्च करना पड़ सकता है।

निवेशकों को क्या देखना चाहिए?

इन्वेस्टर्स को अब डिजिटल सेफ्टी और डेटा रेगुलेशन से जुड़े कानूनों पर नजर रखनी होगी। भारत में भी 'डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन फ्रेमवर्क' जैसे नियम आने के बाद, कंपनियों के लिए बिहेवियरल डेटा का इस्तेमाल करना पहले से मुश्किल होता जा रहा है। आने वाले समय में यह देखना होगा कि क्या कंपनियां अपनी कमाई बरकरार रख पाएंगी या उन्हें यूजर वेलबीइंग (User well-being) को प्राथमिकता देनी होगी।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.