भारत में जून तिमाही के दौरान स्मार्टफोन की शिपमेंट में **10%** की गिरावट दर्ज की गई है। इसकी मुख्य वजह AI डेटा सेंटरों के लिए मेमोरी चिप्स की बढ़ती कीमतें हैं, जिससे हैंडसेट की लागत बढ़ गई है। इस वजह से बजट सेगमेंट के फोन सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं और ग्राहकों को अपना फोन अपग्रेड करने के लिए और इंतजार करना पड़ रहा है।
AI चिप्स की होड़ ने बिगाड़ा खेल
भारत का विशाल स्मार्टफोन बाजार इस वक्त मुश्किल दौर से गुजर रहा है। दुनिया भर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) डेटा सेंटरों की बढ़ती मांग के कारण RAM और स्टोरेज चिप्स की सप्लाई चेन में भारी बदलाव आ रहा है। Samsung, SK Hynix और Micron जैसी बड़ी चिप निर्माता कंपनियां AI-फोक्स्ड प्रोडक्शन को प्राथमिकता दे रही हैं, क्योंकि इससे उन्हें ज्यादा मुनाफा हो रहा है। नतीजतन, कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए स्टैंडर्ड चिप्स की सप्लाई कम हो गई है।
आम आदमी पर क्या हुआ असर?
इस सप्लाई शिफ्ट का भारत पर सबसे ज्यादा असर पड़ा है, क्योंकि यहां करीब 60% स्मार्टफोन की बिक्री ₹20,000 से कम कीमत वाले बजट सेगमेंट में होती है। इस सेगमेंट में कंपनियों का प्रॉफिट मार्जिन पहले से ही काफी कम होता है। जब मेमोरी जैसे कोर कंपोनेंट्स की लागत बढ़ती है, तो कंपनियों को यह बोझ सीधे ग्राहकों पर डालना पड़ता है। ऊपर से, डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये के कमजोर होने से इन पार्ट्स को इंपोर्ट करना और भी महंगा हो गया है। इसका नतीजा यह हुआ कि अलग-अलग मॉडल और ब्रांड्स के हिसाब से स्मार्टफोन की कीमतों में 4% से लेकर 68% तक की बढ़ोतरी देखी गई है।
बजट सेगमेंट और ब्रांड्स का हाल
₹15,000 से कम कीमत वाले सेगमेंट पर सबसे ज्यादा दबाव है, जहां इस तिमाही में शिपमेंट में 45% की भारी गिरावट आई है। इस सेगमेंट पर लंबे समय से विभिन्न चीनी ब्रांडों का दबदबा रहा है, जो अपनी मार्केट पोजीशन बनाए रखने के लिए भारी मात्रा में कम मार्जिन वाली बिक्री पर निर्भर करते हैं। मौजूदा माहौल के कारण जून तिमाही में उनका कलेक्टिव मार्केट शेयर 2020 के बाद सबसे निचले स्तर पर आ गया है। इसके विपरीत, Apple और Samsung जैसे प्रीमियम ब्रांड्स ने बेहतर प्रदर्शन दिखाया है, क्योंकि उनके खरीदार आमतौर पर कीमतों के प्रति कम संवेदनशील होते हैं और अक्सर खरीदारी पूरी करने के लिए विभिन्न फाइनेंसिंग योजनाओं का उपयोग करते हैं।
कंज्यूमर के अपग्रेड साइकल में बदलाव
बढ़ी हुई रिटेल कीमतों के कारण, बहुत से भारतीय ग्राहक अपने मौजूदा डिवाइस को लंबे समय तक इस्तेमाल करने का फैसला कर रहे हैं। डिवाइस बदलने का औसत समय लगभग 3.5 साल से बढ़कर लगभग 4 साल हो गया है। इस व्यवहार परिवर्तन का अप्रैल-जून तिमाही के दौरान कुल शिपमेंट में 10% की साल-दर-साल गिरावट में एक बड़ा योगदान है, जो पिछले छह वर्षों में इस अवधि के लिए सबसे तेज गिरावट है। हालांकि उद्योग के जानकारों को उम्मीद है कि आने वाले महीनों में कीमतों में बढ़ोतरी कम हो सकती है, लेकिन मेमोरी कंपोनेंट्स की यह कमी 2027 के अंत तक इंडस्ट्री के लिए एक कारक बनी रहने की उम्मीद है। मोबाइल हार्डवेयर और कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स रिटेल स्पेस की कंपनियों पर नजर रखने वाले निवेशकों को यह देखना होगा कि क्या कंपनियां इन लगातार लागत दबावों के बीच इन्वेंट्री स्तर को मैनेज कर पाती हैं और मांग बनाए रख पाती हैं।
