भारत में स्मार्टफोन की कीमतें दूसरी तिमाही में **16%** बढ़ गई हैं। ग्लोबल मार्केट में मेमोरी चिप्स की बढ़ती लागत ने स्मार्टफोन कंपनियों की कमर तोड़ दी है, जिसका सीधा असर अब एंट्री-लेवल मार्केट की बिक्री पर दिख रहा है।
बढ़ती लागत का संकट
स्मार्टफोन बाजार में महंगाई का असर साफ दिख रहा है और औसत सेलिंग प्राइस (ASP) रिकॉर्ड USD 318 के स्तर पर पहुंच गया है। इस तेजी के पीछे मुख्य वजह ग्लोबल लेवल पर DRAM और NAND मेमोरी चिप्स की कमी है। डेटा सेंटर और मोबाइल डिवाइस के बीच चिप्स की होड़ ने इनपुट कॉस्ट को काफी बढ़ा दिया है, वहीं कमजोर रुपये के चलते इम्पोर्ट भी महंगा हो गया है।
बजट सेगमेंट पर सबसे बड़ी मार
कीमतों में बढ़ोतरी का सबसे ज्यादा असर सस्ते फोन्स पर पड़ा है। ₹10,000 से कम कीमत वाले बजट सेगमेंट में कीमतें औसतन 32% तक बढ़ी हैं। नतीजतन, इस कैटेगरी की शिपमेंट्स में साल-दर-साल 65% की बड़ी गिरावट आई है। वहीं, ₹10,000 से ₹15,000 वाले मिड-रेंज सेगमेंट में भी 20% की कमी देखी गई है।
प्रीमियम सेगमेंट में कैसे बची जान?
प्रीमियम कैटेगरी में कंपनियां नो-कॉस्ट EMI और ट्रेड-इन प्रोग्राम्स का सहारा लेकर ग्राहकों को लुभा रही हैं। इससे स्मार्टफोन महंगे होने के बावजूद बिक्री पर बहुत ज्यादा असर नहीं पड़ा है। हालांकि, यह पूरी तरह से कंज्यूमर डेट और क्रेडिट पर टिका है, जो भविष्य में एक बड़ा रिस्क बन सकता है।
मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर असर
इन्वेस्टर्स के लिए इलेक्ट्रॉनिक मैन्युफैक्चरिंग सर्विसेज (EMS) कंपनियों पर नजर रखना जरूरी है। ये कंपनियां वॉल्यूम-बेस्ड मॉडल पर काम करती हैं और अगर एंट्री-लेवल मार्केट की वॉल्यूम गिरती रही, तो उनकी कैपेसिटी यूटिलाइजेशन (Capacity Utilization) पर दबाव बढ़ना तय है।
वनप्लस (OnePlus) जैसी कंपनियां इन्वेंट्री पहले से सुरक्षित करके कीमतों को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन मेमोरी चिप्स की यह सप्लाई टाइटनेस 2028 तक बनी रह सकती है। निवेशकों को अब शिपमेंट डेटा और मैन्युफैक्चरर्स के मार्जिन पर पैनी नजर रखनी चाहिए।
