स्मार्टफोन की डिमांड बनाए रखने के लिए कंपनियां अब लीजिंग और सब्सक्रिप्शन मॉडल पर जोर दे रही हैं। ग्राहक अब लंबे समय तक फोन इस्तेमाल कर रहे हैं, ऐसे में कंपनियां मंथली पेमेंट के जरिए लगातार अपग्रेड को बढ़ावा देकर अपनी कमाई और ग्राहक वफादारी बढ़ाना चाहती हैं।
'किराए' पर स्मार्टफोन!
अब वक्त बदल गया है। स्मार्टफोन बनाने वाली बड़ी कंपनियां अब पुराने 'एक बार खरीदो और इस्तेमाल करो' वाले मॉडल से हटकर नई राह पर चल पड़ी हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि ग्राहक अब अपने फोन को पहले से ज्यादा लंबे समय तक इस्तेमाल कर रहे हैं। फोन की बढ़ती कीमतें और नई टेक्नोलॉजी में बहुत बड़े बदलाव न होने की वजह से लोग बार-बार फोन खरीदने से कतरा रहे हैं। इसी को देखते हुए, Apple और Samsung जैसी दिग्गज कंपनियां अब 'लीजिंग' और 'सब्सक्रिप्शन' यानी किराए पर फोन देने वाले मॉडल को तेजी से अपना रही हैं।
ग्राहकों को लुभाने की नई चाल
इन कंपनियों का मकसद है कि ग्राहक उनके ब्रांड इकोसिस्टम से जुड़े रहें। भारत में, Samsung ने 'Galaxy Forever' जैसा प्रोग्राम शुरू किया है, जिसमें आसान फाइनेंसिंग के साथ पुराने फोन को वापस खरीदने की गारंटी भी मिलती है। इससे ग्राहकों के लिए महंगे नए फोन लेना आसान हो जाता है और वे बार-बार अपग्रेड कर पाते हैं।
कंपनियों की कमाई का नया जरिया
फाइनेंशियल एंगल से देखें तो, ये प्रोग्राम कंपनियों के लिए एक तय और लगातार कमाई का जरिया बनते हैं। कम मंथली EMI की वजह से कंपनियां अपने प्रॉफिट मार्जिन को बचाए रख सकती हैं, जो कंपोनेंट और प्रोडक्शन कॉस्ट बढ़ने से दबाव में थे। इसके अलावा, इन लीजिंग अरेंजमेंट्स से कंपनियों को पुराने डिवाइसेज का एक स्थिर स्टॉक वापस मिल जाता है, जिन्हें ठीक करके सेकंड-हैंड मार्केट में बेचा जा सकता है। इससे कमाई का एक और रास्ता खुलता है।
ग्राहक को जोड़े रखने की चुनौती
निवेशकों के लिए, इस बदलाव की कामयाबी इस बात पर निर्भर करती है कि ये प्रोग्राम कस्टमर की लाइफटाइम वैल्यू को कितना बढ़ाते हैं। ग्राहकों को रेगुलर अपग्रेड के चक्कर में फंसाकर, ब्रांड दूसरी कंपनियों के पास जाने का रिस्क कम कर लेते हैं। लेकिन, यह मॉडल पुराने फोन के रीसेल मार्केट पर बहुत ज्यादा निर्भर करता है। अगर प्रीमियम डिवाइसेज की रीसेल वैल्यू गिरती है, तो कंपनियों द्वारा दिए गए बायबैक गारेंटी पर दबाव आ सकता है, जिसका सीधा असर उनके बॉटम लाइन पर पड़ सकता है।
जहां लीजिंग प्रोग्राम बार-बार अपग्रेड करने वालों के लिए लचीलापन देता है, वहीं लंबे समय तक फोन इस्तेमाल करने वालों के लिए यह शायद उतना फायदेमंद न हो। फाइनेंसियल एनालिस्ट्स का मानना है कि जो ग्राहक तीन साल या उससे ज्यादा समय तक फोन इस्तेमाल करना चाहते हैं, उनके लिए सीधे खरीदना ज्यादा सस्ता पड़ता है। ऐसे में, मार्केट में पारंपरिक खरीदारों के साथ-साथ सब्सक्रिप्शन-आधारित यूजर्स का मिश्रण देखने को मिलेगा, न कि मालिकाना हक की आदतों में पूरी तरह बदलाव।
भविष्य के रुझानों पर नजर
इस मॉडल की लंबी अवधि की कामयाबी इस बात पर टिकी होगी कि कंपनियां लौटे हुए डिवाइसेज के अपने इन्वेंट्री को कितनी अच्छी तरह मैनेज करती हैं और भारत जैसे प्राइस-सेंसिटिव मार्केट में इन प्रोग्राम्स की कितनी पैठ बनती है। निवेशकों को इन सब्सक्रिप्शन मॉडलों के एडॉप्शन रेट, एवरेज सेलिंग प्राइस पर असर और पुरानी डिवाइसेज को रीफर्बिश करके दोबारा बेचने के लॉजिस्टिक्स को मैनेज करते हुए मार्जिन बनाए रखने की कंपनियों की क्षमता पर नजर रखनी चाहिए।
