नई दिल्ली में 17 सितंबर से शुरू होने जा रहे Semicon India 2026 का मुख्य फोकस भारत की **95%** की इंपोर्ट निर्भरता को कम करना है। समिट में वैश्विक साझेदारी और घरेलू इकोसिस्टम बनाने पर मंथन होगा, जिस पर निवेशकों की पैनी नजर है।
Semicon India 2026 का आयोजन 17 से 19 सितंबर, 2026 तक नई दिल्ली के यशोभूमि (Yashobhoomi) में किया जाएगा। यह समिट भारत के तेजी से बढ़ते इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर सेक्टर के लिए एक मील का पत्थर साबित हो सकता है। इस आयोजन में 500 से ज्यादा एग्जीबिटर्स और 240 से अधिक इंटरनेशनल कंपनियां हिस्सा लेंगी, जो इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (India Semiconductor Mission) और Semicon 2.0 रोडमैप की प्रगति को प्रदर्शित करेंगी।
तत्काल जरूरत और लंबी अवधि का लक्ष्य
इंडस्ट्री में इस बात पर चर्चा तेज है कि क्या चीन के सप्लायर भी इस समिट में भाग लेंगे। भले ही आधिकारिक पुष्टि न हो, लेकिन भारतीय बाजार में उनकी दिलचस्पी साफ दिखती है। भारत अपनी सेमीकंडक्टर जरूरतों का करीब 95% हिस्सा आयात करता है। मोबाइल असेंबली और हार्डवेयर प्रोडक्शन बढ़ने के साथ यह गैप और भी बड़ा होता जा रहा है। भारतीय मैन्युफैक्चरर्स के लिए कच्चा माल (Raw Material) की निरंतर सप्लाई बनाए रखना एक बड़ी चुनौती है। अगर घरेलू क्षमताएं तेजी से नहीं बढ़ती हैं, तो कंपनियों को चीन जैसे ग्लोबल सप्लायर्स पर निर्भर रहना पड़ सकता है, जो भारत की आत्मनिर्भरता की नीति के साथ टकराव पैदा कर सकता है।
स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप और जोखिम
आयात पर निर्भरता कम करने के लिए सरकार अमेरिका, जापान और नीदरलैंड जैसे देशों के साथ मिलकर काम कर रही है। इसमें ASML जैसी कंपनियों की भूमिका महत्वपूर्ण है। सरकार 'China+1' स्ट्रैटेजी को अपना रही है ताकि सप्लाई चेन को अधिक लचीला (Resilient) बनाया जा सके।
निवेशकों के लिए जोखिम यह है कि किसी एक मार्केट पर ज्यादा निर्भरता भू-राजनीतिक तनाव या ट्रेड बैरियर के समय सप्लाई चेन में रुकावट पैदा कर सकती है। भविष्य में निवेशकों को प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीमों के तहत शुरू होने वाली परियोजनाओं और कंपनियों द्वारा अपनाई जा रही सप्लाई चेन डायवर्सिफिकेशन पर नजर रखनी चाहिए।
