भारत सरकार ने Semicon 2.0 की शुरुआत की है, जिसके तहत ₹1.27 लाख करोड़ का बजट रखा गया है। यह नई पहल खास तौर पर सेमीकंडक्टर डिजाइन इकोसिस्टम को बढ़ावा देने पर केंद्रित है। इसका मकसद भारतीय स्टार्टअप्स को AI और हाई-एंड चिप टेक्नोलॉजी पर काम करने के लिए सपोर्ट करके विदेशी इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी (IP) पर निर्भरता कम करना है।
क्यों अहम है Semicon 2.0?
भारत सरकार ने Semicon 2.0 के नाम से एक नई और बड़ी पॉलिसी की शुरुआत की है, जिसके लिए ₹1.27 लाख करोड़ का मोटा बजट रखा गया है। पिछले फेज में जहां मैन्युफैक्चरिंग पर ज्यादा जोर था, वहीं यह नया प्रोग्राम सीधे तौर पर सेमीकंडक्टर डिजाइन इकोसिस्टम को टारगेट करता है। इसका मुख्य लक्ष्य भारतीय कंपनियों को सिर्फ बैकएंड डिजाइन सर्विस से आगे ले जाकर एडवांस्ड चिप्स, खास कर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और हाई-परफॉरमेंस कंप्यूटिंग के लिए चिप्स डिजाइन करने में सक्षम बनाना है।
बड़े निवेश के लिए नई रणनीति
एडवांस्ड चिप डिजाइन में सबसे बड़ी चुनौती भारी-भरकम लागत रही है। पहले सरकार के सपोर्ट प्रोग्राम में मिलने वाली आर्थिक मदद अक्सर आधुनिक चिप डेवलपमेंट के लिए नाकाफी साबित होती थी। इलेक्ट्रॉनिक्स और IT मंत्रालय के सचिव एस कृष्णन ने कहा कि सस्टेनेबल डिजाइन इकोसिस्टम बनाने के लिए भारत को छोटे-मोटे ग्रांट्स से आगे बढ़ना होगा। Semicon 2.0 के तहत, सरकार वेंचर कैपिटलिस्ट्स (VCs) या अन्य प्राइवेट इन्वेस्टर्स द्वारा लगाए गए फंड के साथ सह-निवेश (co-investment) मॉडल अपनाने का इरादा रखती है। मार्केट को समझने वाले प्राइवेट इन्वेस्टर्स के साथ मिलकर सरकार ज्यादा उम्मीदों वाले स्टार्टअप्स की पहचान करने और R&D वाले प्रोजेक्ट्स का फाइनेंशियल रिस्क शेयर करने की उम्मीद कर रही है।
इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी पर खास फोकस
हालांकि भारत ने 28-नैनोमीटर टेक्नोलॉजी वाली चिप्स के मैन्युफैक्चरिंग प्रोजेक्ट्स को पहले ही मंजूरी दे दी है, जो उपयोगी तो है पर एकदम लेटेस्ट नहीं, Semicon 2.0 का लक्ष्य एडवांस्ड चिप डिजाइन इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी (IP) में सीधे छलांग लगाना है। सरकार ने इस खास सेक्टर में पहले से काम कर रहे 100 से ज्यादा घरेलू स्टार्टअप्स की पहचान की है। यह इनिशिएटिव, जो फाइनेंशियल ईयर 27 से छह साल तक चलेगा, भारत को चिप डिजाइन का हब बनाने की कोशिश करेगा, ठीक उसी समय जब देश अत्याधुनिक कंपोनेंट्स के लिए एक व्यापक घरेलू मैन्युफैक्चरिंग बेस बनाने की दिशा में भी काम कर रहा है।
जोखिम और आगे की राह
निवेशकों के लिए इस प्रोग्राम की सफलता कुछ अहम बातों पर निर्भर करेगी। सबसे पहले, सह-निवेश मॉडल का कार्यान्वयन महत्वपूर्ण होगा; यानी सरकार और वेंचर कैपिटल के बीच साझेदारी कितनी प्रभावी साबित होती है, यह तय करेगा कि फंड कितनी कुशलता से स्टार्टअप्स तक पहुंचता है। दूसरा, भले ही सरकार ने एडवांस्ड डिजाइन में निवेश की फ्लेक्सिबल कैप का संकेत दिया है, लेकिन फंड जारी करने का असल टाइमलाइन और प्रोजेक्ट्स के चयन के मापदंड विकास की गति पर नजर रखने के लिए जरूरी होंगे।
निवेशकों को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि चिप डिजाइन एक हाई-रिस्क वाला बिजनेस है, जिसमें डेवलपमेंट साइकिल लंबा होता है और ताइवान, अमेरिका और दक्षिण कोरिया जैसे क्षेत्रों के स्थापित ग्लोबल प्लेयर्स से कड़ी प्रतिस्पर्धा होती है। इसके अलावा, वेंचर कैपिटल पर निर्भरता का मतलब है कि इन कंपनियों का फाइनेंशियल परफॉरमेंस लंबे समय तक वोलेटाइल रह सकता है। अगली बड़ी जानकारी निवेश कैप्स और सह-निवेश सपोर्ट के लिए योग्य स्टार्टअप्स की चयन प्रक्रिया से संबंधित विशिष्ट गाइडलाइंस का जारी होना होगा।
