Qualcomm Technologies का अनुमान है कि अगले दस सालों में भारत में सेल्फ-ड्राइविंग यानी ऑटोनॉमस गाड़ियाँ (Autonomous Cars) देखने को मिलेंगी। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सेमीकंडक्टर टेक्नोलॉजी में हो रही तरक्की इस बदलाव को सपोर्ट करेगी। सॉफ्टवेयर-डिफाइंड व्हीकल्स (Software-Defined Vehicles) का ये दौर इंसानी गलतियों को कम करके रोड सेफ्टी को बढ़ाएगा, लेकिन इसके लिए लोकल इंफ्रास्ट्रक्चर और सही रेगुलेटरी फ्रेमवर्क का बनना ज़रूरी होगा।
भारत में सेल्फ-ड्राइविंग टेक्नोलॉजी का भविष्य
Qualcomm Technologies के मुताबिक, भारतीय सड़कों पर सेल्फ-ड्राइविंग टेक्नोलॉजी का भविष्य उज्ज्वल है। कंपनी के एग्जीक्यूटिव वाइस प्रेसिडेंट, Nakul Duggal ने बताया कि ऑटोनॉमस ड्राइविंग के लिए ज़रूरी कोर टेक्नोलॉजी तेजी से बेहतर हो रही है। भले ही गाड़ियाँ इंसानों से ज़्यादा सुरक्षित तरीके से चलने की क्षमता रखती हों, लेकिन भारत में इन्हें असलियत में उतारने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर और खास रेगुलेटरी नियमों का बनना बहुत ज़रूरी होगा।
सॉफ्टवेयर-डिफाइंड व्हीकल्स की ओर बढ़ता ऑटो सेक्टर
ऑटो इंडस्ट्री अब मैकेनिकल इंजीनियरिंग से हटकर सॉफ्टवेयर-सेंट्रिक डिज़ाइन की ओर बढ़ रही है। आज की गाड़ियाँfancy डिजिटल प्लेटफॉर्म बन गई हैं, जो पहियों पर चलने वाले रोबोट की तरह हैं। इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EVs) और एडवांस्ड सेमीकंडक्टर चिप्स इस बदलाव के पीछे बड़ी ताकत हैं, जो कार मेकर्स को मैकेनिकल पावर से ज़्यादा सॉफ्टवेयर इंटेलिजेंस पर ध्यान देने का मौका दे रहे हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को इंटीग्रेट करके, कार कंपनियां बेहतर सेफ्टी और पर्सनलाइज्ड यूजर एक्सपीरियंस देने की कोशिश कर रही हैं।
ऑटोमोटिव इनोवेशन में भारत की भूमिका
भारत को ऑटोमोटिव सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट का एक ग्लोबल हब बनाने की कोशिशें तेज हो गई हैं। फॉरेन टेक्नोलॉजी इंपोर्ट करने के बजाय, इंडियन मैन्युफैक्चरर्स अब भारत की खास ड्राइविंग कंडीशंस और ग्राहकों की पसंद के हिसाब से सॉल्यूशंस तैयार कर रहे हैं। Qualcomm ने लोकल प्लेयर्स, जैसे इलेक्ट्रिक मोटरसाइकिल बनाने वाली कंपनी Ultraviolette के साथ मिलकर भारतीय बाजार के लिए खास टेक्नोलॉजी डेवलप की है। यह लोकलाइज्ड अप्रोच इसलिए अहम है क्योंकि ऑटोनॉमस सिस्टम को अलग-अलग और मुश्किल रोड एनवायरनमेंट में चलने के लिए ट्रेन करना पड़ता है, जो दुनिया के दूसरे हिस्सों से काफी अलग होते हैं।
रोड सेफ्टी और इलेक्ट्रॉनिक्स पर असर
ऑटोनॉमस सिस्टम का एक मुख्य फायदा यह है कि ये इंसानी गलतियों से होने वाले रोड एक्सीडेंट्स को काफी हद तक कम कर सकते हैं। एडवांस्ड ड्राइवर असिस्टेंस सिस्टम (ADAS) मल्टी-सेंसर डेटा का इस्तेमाल करके ड्राइविंग एनवायरनमेंट को इंसानों से ज़्यादा तेज़ी से और भरोसे के साथ प्रोसेस करते हैं। सेफ्टी के अलावा, इस सेक्टर के बढ़ने से भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम को भी फायदा होगा। जैसे-जैसे ग्लोबल सप्लाई चेन डाइवर्सिफाई हो रही है, लोकल लेवल पर हाई-एंड चिप्स और सॉफ्टवेयर सॉल्यूशंस की मांग बढ़ने की उम्मीद है।
आगे क्या देखना होगा?
ऑटोनॉमस मोबिलिटी की ओर बढ़ना एक लॉन्ग-टर्म गोल है जो टेक्नोलॉजी के अलावा कई फैक्टर्स पर निर्भर करेगा। इन्वेस्टर्स और मार्केट ऑब्जर्वर्स को व्हीकल ऑटोमेशन से जुड़े गवर्नमेंट पॉलिसीज़, इंफ्रास्ट्रक्चर अपग्रेड की स्पीड और इंडियन मैन्युफैक्चरर्स की इन सॉफ्टवेयर-डिफाइंड प्लेटफॉर्म्स को स्केल करने की काबिलियत पर नज़र रखनी चाहिए। आखिरकार, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि रेगुलेटरी एनवायरनमेंट इन एडवांस्ड टेक्नोलॉजीज को कितनी जल्दी अपना पाता है और पब्लिक सेफ्टी को कैसे सुनिश्चित करता है।
