बेंगलुरु की स्पेस-टेक कंपनी Pixxel ने अमेरिका में अपनी नई सब्सिडियरी 'Pixxel Federal' लॉन्च कर दी है। इसका मकसद अमेरिकी डिफेंस और इंटेलिजेंस सेक्टर के बड़े कॉन्ट्रैक्ट्स हासिल करना है।
अमेरिका में विस्तार और नई जिम्मेदारी
बेंगलुरु स्थित स्पेस-टेक स्टार्टअप Pixxel ने अमेरिकी डिफेंस, इंटेलिजेंस और सिविलियन सेक्टर में पैठ बनाने के लिए 'Pixxel Federal' की स्थापना की है। इस नई इकाई की कमान Allyson Jenkin को सौंपी गई है, जो 2025 से कंपनी के लिए अमेरिकी सरकार के साथ संबंधों को देख रही थीं। इस विस्तार का मुख्य लक्ष्य अमेरिकी फेडरल प्रोक्योरमेंट इकोसिस्टम में सीधी पहुंच बनाना है, जहां दुनिया का सबसे बड़ा डिफेंस बजट खर्च होता है।
मौजूदा पार्टनर्स और ट्रैक रिकॉर्ड
Pixxel पहले से ही अमेरिका की कई बड़ी संस्थाओं के साथ काम कर रही है। कंपनी के पास National Reconnaissance Office के साथ हाइपरस्पेक्ट्रल रिमोट सेंसिंग के लिए कॉन्ट्रैक्ट्स हैं। साथ ही, यह NASA के Commercial SmallSat Data Acquisition Program का भी हिस्सा है। स्थानीय मौजूदगी से कंपनी को अब भविष्य में रेवेन्यू के नए और स्थायी स्रोत मिलने की उम्मीद है।
बड़ी फंडिंग और वित्तीय मजबूती
यह कदम सितंबर 2026 में पूरी हुई $100 मिलियन की सीरीज-सी फंडिंग के ठीक बाद उठाया गया है, जिसका नेतृत्व Temasek और Seraphim जैसे बड़े निवेशकों ने किया था। इसके साथ ही कंपनी की कुल जुटाई गई पूंजी $195 मिलियन तक पहुंच गई है। कंपनी फिलहाल बेंगलुरु में 30,000 वर्ग फुट की फैसिलिटी में अपने 'Firefly' सैटेलाइट का निर्माण कर रही है।
भारत में भी बड़ी हलचल
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विस्तार के साथ-साथ Pixxel घरेलू बाजार में भी काफी सक्रिय है। कंपनी एक कंसोर्टियम का नेतृत्व कर रही है, जिसमें Piersight Space, Satsure Analytics India और Dhruva Space शामिल हैं। इस प्रोजेक्ट में ₹1,200 करोड़ का निवेश किया जाएगा, जिसका लक्ष्य अगले 5 सालों में 12 स्वदेशी सैटेलाइट्स को लॉन्च करना है।
निवेश से जुड़ी चेतावनी
निवेशकों को यह समझना होगा कि Pixxel अभी एक प्राइवेट और वेंचर-बैक्ड स्टार्टअप है। इसके शेयर पब्लिक एक्सचेंज पर उपलब्ध नहीं हैं, यानी इसमें लिक्विडिटी का अभाव है। इसके अलावा, अमेरिका का डिफेंस मार्केट अत्यधिक प्रतिस्पर्धी है। भविष्य की सफलता पूरी तरह से सरकारी कॉन्ट्रैक्ट्स जीतने पर टिकी है; यदि प्रोजेक्ट्स में देरी हुई या कॉन्ट्रैक्ट्स नहीं मिले, तो कंपनी के कैश फ्लो और फंडिंग पर दबाव बन सकता है।
