Persistent Systems और Coforge का बड़ा दांव: ₹30,000 करोड़ से ज़्यादा के ग्लोबल सौदे!

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
Persistent Systems और Coforge का बड़ा दांव: ₹30,000 करोड़ से ज़्यादा के ग्लोबल सौदे!

भारतीय आईटी सेक्टर की मिड-टियर कंपनियां, Persistent Systems और Coforge, बड़े अधिग्रहणों के ज़रिए अपनी ग्लोबल पहुंच बढ़ा रही हैं। दोनों कंपनियों ने कुल **$3.65 बिलियन** (लगभग ₹30,000 करोड़ से ज़्यादा) के सौदे किए हैं, जिनका मकसद AI और ग्लोबल इंजीनियरिंग क्षमताओं को मज़बूत करना है। ये कंपनियां बड़ी आईटी कंपनियों को पछाड़कर मिड-साइज़्ड कॉन्ट्रैक्ट जीत रही हैं और AI का इस्तेमाल करके अपनी एफिशिएंसी बढ़ा रही हैं। अब निवेशकों की नज़रें इस बात पर हैं कि ये बड़े अधिग्रहण इन कंपनियों के डेट लेवल और भविष्य के प्रॉफिट मार्जिन को कैसे प्रभावित करते हैं।

क्यों हो रहा है यह बड़ा फेरबदल?

भारतीय आईटी कंपनियां, खासकर मिड-टियर की, विदेशी बाज़ारों में अपनी धाक जमाने के लिए बड़े कदम उठा रही हैं। Persistent Systems ने जर्मन फर्म Nagarro के साथ $1.3 बिलियन का सौदा किया है, वहीं Coforge ने कैलिफोर्निया की Encora को $2.35 बिलियन में खरीदा है। इस स्ट्रेटेजी से वे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और इंजीनियरिंग क्षमताओं में तेज़ी से आगे बढ़कर बड़ी आईटी कंपनियों को सीधी टक्कर देने की तैयारी में हैं।

AI-संचालित इंजीनियरिंग का नया दौर

इन अधिग्रहणों के पीछे का मुख्य उद्देश्य डेटा, क्लाउड और AI इंजीनियरिंग को एकीकृत (Integrate) करने वाले विशेष प्लेटफॉर्म तैयार करना है। Coforge का Encora को खरीदने का मकसद $2 बिलियन का ऐसा प्लेटफॉर्म बनाना है जो रिजल्ट-आधारित कॉन्ट्रैक्ट्स पर केंद्रित हो। वहीं, Persistent Systems, Nagarro की मज़बूत यूरोपीय उपस्थिति का फायदा उठाकर अपने पारंपरिक बाज़ारों से आगे बढ़ना चाहती है। Mphasis जैसी अन्य कंपनियां भी इसमें पीछे नहीं हैं, जिन्होंने AI डिसीजनिंग सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए Theory and Practice जैसी फर्मों का अधिग्रहण किया है।

मिड-कैप आईटी का दमदार प्रदर्शन

फाइनेंशियल ईयर 2025-26 के आंकड़े बताते हैं कि मिड-टियर आईटी फर्में बड़ी कंपनियों की तुलना में तेज़ी से बढ़ रही हैं। जहां TCS, Infosys, Wipro और HCLTech जैसी बड़ी कंपनियों का कंबाइंड रेवेन्यू करीब $80 बिलियन रहा और ग्रोथ धीमी थी, वहीं Coforge, Persistent Systems, Mphasis और Hexaware जैसे मिड-कैप सेगमेंट ने लगभग $7 बिलियन का रेवेन्यू दर्ज किया और डबल-डिजिट ग्रोथ हासिल की। Coforge ने तो पिछले साल के मुकाबले अपने रेवेन्यू में लगभग 30% की बढ़ोतरी देखी। इस तेज़ी की वजह से वे $50-100 मिलियन रेंज के सौदे हासिल कर पा रहे हैं, जिन पर पहले बड़ी कंपनियों का ही दबदबा था।

AI बिज़नेस मॉडल को कैसे बदल रहा है?

AI के आने से इन कंपनियों के काम करने का तरीका भी बदल रहा है। जूनियर लेवल की इंजीनियरिंग के कामों को ऑटोमेट करके, कंपनियां ज़्यादा एफिशिएंट वर्कफोर्स मॉडल की ओर बढ़ रही हैं। इससे मिड-टियर फर्में अपने लीन स्ट्रक्चर और छोटे कॉन्ट्रैक्ट साइकल के अनुभव का फायदा उठा पा रही हैं। साथ ही, एक ही तरह के काम को कई क्लाइंट्स के लिए इस्तेमाल करने की क्षमता (Intellectual Property Reuse) से एफिशिएंसी बढ़ने और प्रॉफिट मार्जिन को सपोर्ट मिलने की उम्मीद है।

जोखिम और निवेशकों के लिए ज़रूरी बातें

हालांकि ये अधिग्रहण ग्रोथ का संकेत हैं, लेकिन इनमें कुछ जोखिम भी हैं जिन पर निवेशकों को नज़र रखनी चाहिए। बड़े अधिग्रहणों के लिए काफी कैपिटल की ज़रूरत होती है, जिससे डेट बढ़ सकता है या इक्विटी डाइल्यूशन हो सकता है, जो भविष्य की फाइनेंशियल फ्लेक्सिबिलिटी को प्रभावित कर सकता है। साथ ही, इन सौदों की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि कंपनियां अपनी नई इंटरनेशनल टीमों और टेक्नोलॉजी को मौजूदा ऑपरेशन्स में बिना किसी बाधा के कैसे इंटीग्रेट करती हैं। निवेशकों के लिए मुख्य निगरानी बिंदु इंटीग्रेशन की टाइमलाइन, डेट-टू-इक्विटी रेशियो पर इन डील्स का असर और क्या ये फर्में डबल-डिजिट रेवेन्यू ग्रोथ बनाए रखते हुए AI-आधारित एफिशिएंसी का वादा पूरा कर पाएंगी, ये सब होंगे।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.