पेरिस कोर्ट ऑफ अपील्स ने Meta Platforms की अपील खारिज कर दी है। अब कंपनी को न्यूज पब्लिशर्स के साथ ऑनलाइन कंटेंट के इस्तेमाल के लिए निष्पक्ष मुआवजा तय करना होगा और रेवेन्यू डेटा में पारदर्शिता बरतनी होगी।
रॉयल्टी का पेंच और कोर्ट का रुख
पेरिस कोर्ट ऑफ अपील्स के हालिया फैसले ने Meta Platforms की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि कंपनी को प्रेस एजेंसियों और पब्लिशर्स को कंटेंट के बदले रॉयल्टी देनी होगी। कोर्ट ने मेटा की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें वे रेवेन्यू डेटा साझा करने और बातचीत करने की रेगुलेटरी शर्तों का विरोध कर रहे थे।
'नेबरिंग राइट्स' (Neighboring Rights) का असर
इस पूरे मामले के केंद्र में 'नेबरिंग राइट्स' का नियम है। यूरोपीय यूनियन (EU) के इस फ्रेमवर्क का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि जब डिजिटल प्लेटफॉर्म किसी पब्लिशर का कंटेंट इस्तेमाल करें, तो उन्हें इसका उचित भुगतान मिले। कोर्ट का मानना है कि मेटा अपनी मार्केट पावर का गलत इस्तेमाल कर रही थी और खुद तय कर रही थी कि कंटेंट की वैल्यू क्या होगी।
बिग टेक पर बढ़ता रेगुलेटरी दबाव
यह फैसला यूरोप में बिग टेक कंपनियों पर बढ़ रही रेगुलेटरी सख्ती का एक हिस्सा है। मेटा को अब न केवल रॉयल्टी चुकानी होगी, बल्कि उसे यह भी बताना होगा कि उसका प्लेटफॉर्म कंटेंट के साथ कैसे इंटरैक्ट करता है। साथ ही, कंपनी अब प्रेस कंटेंट की विजिबिलिटी को जानबूझकर घटा नहीं सकती, जिसे पहले वह सौदेबाजी के लिए हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने के आरोपों का सामना कर रही थी।
निवेशकों के लिए क्या है मतलब?
निवेशकों की नजर इस बात पर है कि क्या यह मॉडल बाकी देशों में भी लागू होगा। Google (Alphabet) जैसी कंपनियों ने भी पहले ऐसे कानूनी विवादों का सामना किया है। विश्लेषकों का मानना है कि यूरोप में बढ़ रहे ये नियम आने वाले समय में मेटा के ऑपरेशनल खर्च (Operating Expenses) को बढ़ा सकते हैं और यह ट्रेंड भारत जैसे देशों में भी डिजिटल कॉम्पिटिशन कानूनों को सख्त बनाने के लिए एक उदाहरण बन सकता है।
