Creator Economy: 'Supari' गैंग का खौफ, इंडियन कंटेंट क्रिएटर्स की कमाई पर मंडराया बड़ा खतरा

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AuthorMehul Desai|Published at:
Creator Economy: 'Supari' गैंग का खौफ, इंडियन कंटेंट क्रिएटर्स की कमाई पर मंडराया बड़ा खतरा

भारत के तेजी से बढ़ते क्रिएटर इकोनॉमी सेक्टर पर अब 'Mass-Reporting' का काला साया मंडरा रहा है। यह सेक्टर **$100 बिलियन** से अधिक की वैल्यूएशन तक पहुंचने की राह पर है, लेकिन पेड मास-रिपोर्टिंग सर्विसेज के जरिए अब क्रिएटर्स के अकाउंट्स को टारगेट कर बंद करवाया जा रहा है, जिससे ब्रांड पार्टनरशिप और विज्ञापन रेवेन्यू दांव पर लग गए हैं।

भारत के डिजिटल इकोसिस्टम में एक नई और खतरनाक मुसीबत पैदा हो गई है जिसे 'सुपारी किलर्स' की तरह देखा जा रहा है। ये गिरोह पैसों के बदले किसी भी कंटेंट क्रिएटर की ऑनलाइन मौजूदगी को खत्म करने के लिए मास-रिपोर्टिंग बॉट्स का इस्तेमाल करते हैं। यह केवल सोशल मीडिया का ड्रामा नहीं है, बल्कि उस क्रिएटर इकोनॉमी के लिए बड़ा वित्तीय जोखिम है, जिसका अनुमान $100 बिलियन से $125 बिलियन के बीच है।

इन्फ्लुएंसर इकोनॉमी में बिजनेस रिस्क

इन्वेस्टर्स के लिए चिंता की बात यह है कि रेवेन्यू स्ट्रीम कितनी असुरक्षित है। भारतीय क्रिएटर्स सालाना $350 बिलियन के कंज्यूमर खर्च को प्रभावित करते हैं। यही वजह है कि आज FMCG और D2C कंपनियां अपने विज्ञापन बजट का एक बड़ा हिस्सा इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग पर खर्च कर रही हैं। जब किसी क्रिएटर का अकाउंट बैन होता है, तो कंपनियों की ब्रांड डील्स और विज्ञापन कॉन्ट्रैक्ट्स अचानक खत्म हो जाते हैं।

जो कंपनियां अपनी मार्केटिंग के लिए सिर्फ कुछ चुनिंदा इन्फ्लुएंसर्स पर निर्भर हैं, उन्हें अब 'प्लेटफॉर्म डिपेंडेंसी' का बड़ा रिस्क उठाना पड़ रहा है। अगर कोई प्लेटफॉर्म किसी रेवेन्यू-जनरेटिंग पार्टनर को बैन करता है, तो ब्रांड की पूरी मार्केटिंग स्ट्रेटजी फेल हो जाती है।

प्लेटफॉर्म की जवाबदेही और रेगुलेटरी दबाव

यह सारा संकट मेटा (Meta) जैसे प्लेटफॉर्म्स के ऑटोमेटेड मॉडरेशन सिस्टम की खामियों के कारण है। ये गिरोह पुराने और एक्टिव अकाउंट्स के नेटवर्क का इस्तेमाल करके यूजर फीडबैक की नकल करते हैं, जिससे ऑटोमेटेड सिस्टम भ्रमित हो जाते हैं और सही सलामत अकाउंट्स पर कार्रवाई कर देते हैं। ये गिरोह अपनी पहचान छिपाने के लिए अक्सर क्रिप्टोकरेंसी में भुगतान मांगते हैं।

हाल के कुछ दुखद मामलों के बाद, जिसमें एक फाइनेंस इन्फ्लुएंसर की मौत की चर्चा भी हुई, अब रेगुलेटर्स और कानून प्रवर्तन एजेंसियों ने इस पर सख्ती शुरू कर दी है। अब नजर इस पर टिकी है कि प्लेटफॉर्म्स अपने मॉडरेशन लॉजिक को कैसे अपग्रेड करते हैं। यदि प्लेटफॉर्म्स ने ऑर्गेनिक फीडबैक और सुनियोजित 'हिट' कैंपेन के बीच का अंतर पहचानना नहीं सीखा, तो ब्रांड्स के लिए यह अनिश्चितता बनी रहेगी।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.