मोबाइल सेक्टर में क्रांति! ₹62,500 करोड़ की नई स्कीम, अब R&D और लोकल ब्रांड्स पर फोकस

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AuthorMehul Desai|Published at:
मोबाइल सेक्टर में क्रांति! ₹62,500 करोड़ की नई स्कीम, अब R&D और लोकल ब्रांड्स पर फोकस

भारत सरकार ने मोबाइल फोन इंडस्ट्री में एक बड़ा कदम उठाया है। ₹62,500 करोड़ की नई इंसेटिव स्कीम लॉन्च की गई है, जिसका मकसद कंपनियों को सिर्फ असेंबलिंग से आगे बढ़कर रिसर्च और डेवलपमेंट (R&D) के साथ-साथ स्वदेशी ब्रांड बनाने के लिए प्रोत्साहित करना है। इस स्कीम के तहत **9.5%** तक के इंसेंटिव्स दिए जाएंगे।

असेंबली से वैल्यू एडिशन की ओर

सरकार ने ₹62,500 करोड़ के बजट के साथ मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग स्कीम (MPMS) की शुरुआत की है, जिसका लक्ष्य घरेलू इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर को वैल्यू चेन में ऊपर ले जाना है। पिछली पॉलिसियां जहाँ बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन बढ़ाने पर केंद्रित थीं, वहीं यह नया प्रोग्राम वैल्यू एडिशन पर जोर देता है। इसमें मैन्युफैक्चरिंग के लिए 2.25% से 5% का बेस इंसेंटिव मिलेगा। इसके अलावा, लोकल कंपोनेंट सोर्सिंग के लिए 1.5% और स्वदेशी ब्रांड्स को बढ़ावा देने के लिए 3% का अतिरिक्त फायदा होगा। इस तरह, कुल मिलाकर 9.5% तक का इंसेंटिव मिल सकता है, जो कि काफी अहम है क्योंकि कई इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरर्स का ऑपरेटिंग मार्जिन अक्सर 3-4% के आसपास ही रहता है।

सिर्फ असेंबलिंग से आगे

इस पॉलिसी का मकसद एक पुरानी कमी को दूर करना है, जहाँ भारत में ऑपरेट करने वाली कंपनियां ग्लोबल ब्रांड्स के लिए सिर्फ असेंबलर बनकर रह गई थीं, न कि इनोवेटर। रिसर्च और डेवलपमेंट (R&D) और स्वदेशी पेटेंट बनाने से वित्तीय लाभ को जोड़कर, इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्रालय (Meity) एक सेल्फ-सस्टेनिंग इकोसिस्टम बनाने की कोशिश कर रहा है। इस कदम से कंपनियों को हाई-वॉल्यूम, लो-मार्जिन कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरिंग के धंधे से बाहर निकलने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा, जिसमें ऐतिहासिक रूप से ग्लोबल प्लेयर्स का दबदबा रहा है।

बड़ी इलेक्ट्रॉनिक्स योजना का हिस्सा

यह स्कीम एक व्यापक ₹2.29 लाख करोड़ की पांच-वर्षीय राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स योजना का हिस्सा है। यह ₹1.27 लाख करोड़ की सेमीकॉन 2.0 पहल, जो सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन पर केंद्रित है, और ₹40,000 करोड़ की इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट्स मैन्युफैक्चरिंग स्कीम (ECMS) के साथ मिलकर काम करेगी। प्रिंटेड सर्किट बोर्ड, डिस्प्ले यूनिट और कैमरा मॉड्यूल जैसे महत्वपूर्ण पुर्जों के लोकल प्रोडक्शन को सपोर्ट करके, सरकार का इरादा प्रोडक्शन की लागत कम करना और घरेलू ब्रांड्स के लिए सप्लाई चेन की सुरक्षा में सुधार करना है। इंडस्ट्री के जानकारों का कहना है कि इस रणनीति की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या यह Micromax और Lava जैसी कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगियों के मुकाबले मार्केट शेयर हासिल करने में मदद कर पाती है।

संभावित जोखिम और बाजार का संदर्भ

निवेशकों को इस बात पर नजर रखनी चाहिए कि मैन्युफैक्चरर्स कितनी प्रभावी ढंग से R&D-हैवी ऑपरेशंस में ट्रांजिशन कर पाते हैं, क्योंकि इसके लिए असेंबली की तुलना में काफी अलग टैलेंट और कैपिटल एलोकेशन की जरूरत होती है। एग्जीक्यूशन की चुनौती भी है, क्योंकि पिछली योजनाओं को कभी-कभी सिर्फ असेंबली-लाइन सेटअप के बजाय डीप लोकल इंटीग्रेशन सुनिश्चित करने में कठिनाई हुई है। इसके अलावा, भारतीय ब्रांड्स की ग्लोबल मैन्युफैक्चरर्स से प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे विदेशी संस्थाओं के स्केल, प्राइसिंग और डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क का मुकाबला कर पाते हैं या नहीं। निवेशकों के लिए अगला कदम यह देखना होगा कि इन इंसेंटिव्स को कैसे क्लेम किया जाएगा और क्या कंपनियां 'स्वदेशी ब्रांड' और 'कंपोनेंट सोर्सिंग' बोनस के लिए विशिष्ट आवश्यकताओं को पूरा कर पाती हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.