Netskope के CEO संजय बेरी ने कंपनियों को चेतावनी दी है कि वे ऑटोनॉमस AI एजेंट्स के लिए सख्त 'Zero-Trust' प्रोटोकॉल अपनाएं। भारत में कंपनी सालाना **$100 मिलियन** खर्च कर अपना विस्तार कर रही है ताकि डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट की चुनौतियों से निपटा जा सके।
साइबर सिक्योरिटी फर्म Netskope के फाउंडर और CEO संजय बेरी ने एंटरप्राइजेज को लेकर एक बड़ी चिंता जताई है। बेरी का मानना है कि कंपनियां जो ऑटोनॉमस AI एजेंट्स का इस्तेमाल कर रही हैं, वे अगर बिना किसी सुरक्षा घेरे के काम करेंगे तो डेटा में हेरफेर का खतरा बढ़ सकता है। उन्होंने साफ कहा कि अब 'Zero-Trust' प्रोटोकॉल अपनाना ही एकमात्र रास्ता है, जहां हर इंटरेक्शन को तब तक संदिग्ध माना जाए जब तक वह वेरिफाई न हो जाए।
जिम्मेदारी किसकी?
बेरी के अनुसार, यदि कोई थर्ड-पार्टी AI टूल डेटा ब्रीच करता है, तो उसकी पूरी जिम्मेदारी उस कंपनी की होगी जो उस टूल को डिप्लॉय कर रही है। कंपनी का मानना है कि AI एजेंट्स को केवल एक मददगार टूल के बजाय एक संभावित सिक्योरिटी रिस्क के रूप में देखना जरूरी है। अगर ये एजेंट्स अपने कंट्रोल एनवायरनमेंट (Sandboxes) से बाहर निकलते हैं, तो यह सीधे तौर पर खराब गवर्नेंस और टेस्टिंग की विफलता है।
भारत में भारी निवेश और विस्तार
भारत में अपनी मौजूदगी को मजबूत करते हुए Netskope अब $100 मिलियन सालाना खर्च कर रही है। फिलहाल कंपनी में 1,300 कर्मचारी हैं, जिनमें से आधे से ज्यादा इंजीनियरिंग भूमिकाओं में हैं। यह निवेश मुख्य रूप से घरेलू कंपनियों को ग्लोबल साइबर सिक्योरिटी मानकों और 'डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट' (Digital Personal Data Protection Act) के लिए तैयार करने के लिए है।
'Shadow AI' का बढ़ता खतरा
भारतीय मार्केट में अब बड़ी चुनौती 'Shadow AI' की है, जहां IT विभाग की अनुमति के बिना ही कर्मचारी AI टूल्स का इस्तेमाल कर रहे हैं। कंपनियों के लिए अब साइबर सिक्योरिटी को एक 'Optional' खर्च नहीं, बल्कि 'Mandatory' ऑपरेशनल लागत के रूप में देखना होगा।
