US में H-1B वीज़ा आवेदनों पर भारी भरकम **$1,03,265** का शुल्क लगाने का प्रस्ताव पेश किया गया है, जिसका Nasscom ने कड़ा विरोध किया है। भारतीय IT कंपनियां अब स्थानीय स्तर पर हायरिंग कर रही हैं, लेकिन इस नए रेगुलेटरी बोझ से प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव का डर निवेशकों को सता रहा है।
बिजनेस मॉडल पर असर
निवेशकों के मन में सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर यह प्रस्तावित शुल्क कानून बन जाता है, तो Tata Consultancy Services, Infosys और Wipro जैसी दिग्गज कंपनियों के बॉटम लाइन पर इसका कितना बुरा असर पड़ेगा। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में भारतीय IT कंपनियों ने भारत से कर्मचारी भेजने के पारंपरिक मॉडल से दूरी बनाई है। इन कंपनियों ने US में $1.1 बिलियन से अधिक का निवेश STEM पाइपलाइन में किया है और स्थानीय स्तर पर टैलेंट हायरिंग पर जोर दिया है। आज इन कंपनियों का एक बड़ा हिस्सा अमेरिकी वर्कफोर्स का स्थानीय है, जो इमिग्रेशन पॉलिसी में उतार-चढ़ाव के खिलाफ एक 'नेचुरल हेज' के रूप में काम करता है।
रेगुलेटरी और कानूनी पेंच
यह पहली बार नहीं है जब IT इंडस्ट्री पर वीज़ा लागत बढ़ाने की कोशिश की गई है। इससे पहले भी जून 2026 में एक ऐसी ही कोशिश को फेडरल कोर्ट ने खारिज कर दिया था। ताजा प्रस्ताव एक औपचारिक रेगुलेटरी प्रक्रिया के जरिए लाया जा रहा है, जिससे यह साफ है कि इसे कानूनी और प्रशासनिक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। फिलहाल, US डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी ने 30 दिनों का पब्लिक कमेंट पीरियड रखा है, जहां कंपनियां इस फैसले के आर्थिक प्रभाव पर अपना डेटा पेश कर सकेंगी।
निवेशकों के लिए रिस्क और मॉनिटरेबल
H-1B वीज़ा पर निर्भरता कम होने के बावजूद, यह प्रस्ताव मार्केट में अनिश्चितता का माहौल पैदा कर रहा है, जिससे शेयरों में उतार-चढ़ाव (volatility) देखने को मिल सकती है। अगर यह शुल्क लागू हुआ, तो ऑपरेटिंग मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है। निवेशकों को सलाह है कि वे आने वाली अर्निंग्स कॉल (Earnings Calls) के दौरान कंपनियों के मैनेजमेंट की कमेंटरी पर नज़र रखें, विशेष रूप से इस बात पर कि उनका वीज़ा एक्सपोज़र कितना है और इसका भविष्य के गाइडेंस पर क्या असर होगा।
