NITI Aayog ने टेलीकॉम और नेटवर्क इक्विपमेंट (TANE) सेक्टर को 2035 तक 50 अरब डॉलर का एक्सपोर्ट हब बनाने के लिए नए पॉलिसी कदम प्रस्तावित किए हैं। रिपोर्ट बताती है कि भारतीय निर्माताओं को अभी 26-29% की लागत की कमी का सामना करना पड़ रहा है, जिससे इंपोर्ट पर भारी निर्भरता है।
क्या है NITI Aayog का रोडमैप?
NITI Aayog ने 13 अगस्त, 2026 को जारी एक नई रिपोर्ट में भारत को टेलीकॉम और नेटवर्क इक्विपमेंट (TANE) के बड़े ग्लोबल एक्सपोर्टर के तौर पर स्थापित करने की योजना का खुलासा किया है। इस महत्वाकांक्षी प्लान का लक्ष्य 2035 तक एक्सपोर्ट को 50 अरब डॉलर तक पहुंचाना है। थिंक टैंक का मानना है कि इसके लिए सरकार को उन संरचनात्मक समस्याओं को दूर करना होगा, जो भारतीय कंपनियों को ग्लोबल सप्लायर्स के साथ प्रतिस्पर्धा करने में रोक रही हैं।
इंपोर्ट पर भारी निर्भरता और लागत का अंतर
फिलहाल TANE सेक्टर का अनुमानित मूल्य 25 अरब डॉलर है, लेकिन इसमें बड़ा ट्रेड डेफिसिट (व्यापार घाटा) है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत सालाना 4 अरब डॉलर से 5 अरब डॉलर का इंपोर्ट करता है, जबकि एक्सपोर्ट केवल 0.6 अरब डॉलर से 1 अरब डॉलर तक सीमित है। 5G बेस स्टेशन, सिग्नल प्रोसेसर और एंटीना जैसे महत्वपूर्ण कंपोनेंट्स के लिए विदेशी सप्लायर्स पर 80% से अधिक निर्भरता एक बड़ी रुकावट है, जिसमें ज्यादातर इंपोर्ट चीन से होता है।
'फिस्कल डिसेबिलिटी' बन रही रोड़ा
निवेशकों और मार्केट जानकारों के लिए सबसे बड़ी चुनौती 'फिस्कल डिसेबिलिटी' है, यानी भारतीय निर्माताओं को अंतर्राष्ट्रीय प्रतिद्वंद्वियों की तुलना में 26% से 29% अधिक लागत का सामना करना पड़ रहा है। इस लागत अंतर के कारण स्थानीय कंपनियां अपने प्रोडक्ट्स को कॉम्पिटिटिव प्राइस पर नहीं बेच पा रही हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि इसका एक कारण यह भी है कि भारत में मैन्युफैक्चरिंग अक्सर हाई-वैल्यू प्रोडक्शन के बजाय साधारण असेंबली पर केंद्रित रहती है, जिससे डोमेस्टिक वैल्यू एडिशन 20% से नीचे रहता है।
प्रोक्योरमेंट की आदतें और PLI की भूमिका
एक और अहम मुद्दा प्रोक्योरमेंट (खरीद) की आदतें हैं। भारत में प्राइवेट टेलीकॉम ऑपरेटर्स, जो इक्विपमेंट के सबसे बड़े खरीदार हैं, पारंपरिक रूप से स्थापित अंतर्राष्ट्रीय ब्रांडों को तरजीह देते रहे हैं। इससे स्थानीय निर्माताओं के लिए स्केल-अप करना मुश्किल हो जाता है, भले ही सरकार डोमेस्टिक सोर्सिंग को बढ़ावा दे रही हो।
NITI Aayog की रिपोर्ट सुझाव देती है कि प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) जैसी मौजूदा योजनाएं एक अच्छी शुरुआत हैं, लेकिन स्थायी प्रभाव के लिए उन्हें और अधिक समर्थन की आवश्यकता है। इन पॉलिसी बदलावों को लागू करने से यह सेक्टर इंपोर्ट-डिपेंडेंट मॉडल से बदलकर ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब बन सकता है। अनुमान है कि इससे राष्ट्रीय GDP में सेक्टर का योगदान दोगुना हो सकता है और लगभग 5 लाख स्किल्ड नौकरियां पैदा हो सकती हैं।
आगे क्या?
आगे चलकर, निवेशकों के लिए सरकार की विशिष्ट पॉलिसी प्रतिक्रियाओं पर नजर रखना महत्वपूर्ण होगा। इन उपायों की प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे लागत अंतर को पाट सकते हैं, हाई-वैल्यू डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग को प्रोत्साहित कर सकते हैं, और बड़े टेलीकॉम ऑपरेटर्स को अपनी स्थानीय सोर्सिंग बढ़ाने के लिए प्रेरित कर सकते हैं या नहीं।
