NITI Aayog अब टेक कंपनियों के साथ मिलकर यह जांच कर रहा है कि ऑनलाइन कंटेंट हटाने के मौजूदा नियम कितने व्यावहारिक हैं। इस कदम का मकसद सरकारी नियमों को आसान बनाना है, जिससे टेक कंपनियों पर अनुपालन का बोझ कम हो सके।
टेक कंपनियों पर अनुपालन का बोझ
भारत सरकार का थिंक टैंक NITI Aayog अब देश के टेक्नोलॉजी नियमों की समीक्षा कर रहा है। खास तौर पर, डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को ऑनलाइन कंटेंट हटाने में आ रही दिक्कतों पर ध्यान दिया जा रहा है। 25 जून को हुई एक मीटिंग में, NITI Aayog ने Nasscom, CII, IAMAI और BIF जैसे प्रमुख उद्योग संगठनों के साथ चर्चा की और विभिन्न टेक कंपनियों से फीडबैक लिया।
इस बातचीत का मुख्य फोकस यह जानना था कि क्या मौजूदा ग्रीवेंस (शिकायत) और पारदर्शिता की समय-सीमाएं (timelines) अलग-अलग आकार की कंपनियों के लिए व्यावहारिक हैं। NITI Aayog जानना चाहता है कि कौन से ड्यू डिलिजेंस (due diligence) नियम कंपनियों के लिए सबसे ज्यादा परिचालन संबंधी बोझ पैदा करते हैं।
'जन विश्वास सिद्धांत' के तहत सरलीकरण
यह समीक्षा 'जन विश्वास सिद्धांत' (Jan Vishwas Siddhant) पहल का हिस्सा है। इसका उद्देश्य विभिन्न क्षेत्रों में मौजूदा कानूनों को युक्तिसंगत बनाकर एक भरोसे पर आधारित नियामक माहौल बनाना है।
कंटेंट हटाने की समय-सीमाओं पर चिंता
उद्योग जगत ने पहले भी IT (Intermediary Guidelines and Digital Media Ethics Code) Rules, 2021 के तहत कुछ खास तरह के कंटेंट को हटाने के लिए तय की गई 2-3 घंटे की छोटी समय-सीमा पर चिंता जताई है। Meta Platforms जैसी बड़ी कंपनियों के लिए, इतने कम समय में फ्लैग किए गए कंटेंट की समीक्षा करना और उसे वेरिफाई करना बेहद मुश्किल साबित होता है। कंपनियों का तर्क है कि इस तेज प्रक्रिया से वे पूरी जांच नहीं कर पातीं, जिससे गलतियां होने की संभावना बढ़ जाती है।
बढ़ते सरकारी आदेश और नियमन
NITI Aayog का यह कदम इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि सरकार द्वारा जारी कंटेंट ब्लॉक करने के आदेशों की संख्या तेजी से बढ़ी है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, 2025 में ऐसे 24,000 से अधिक आदेश जारी किए गए, जो पिछले साल की तुलना में काफी ज्यादा है। हालांकि IT मंत्रालय मुख्य रूप से IT Act, 2000 की धारा 69(A) के तहत कार्रवाई करता है, लेकिन इन आदेशों की बढ़ती संख्या ने प्लेटफॉर्म गवर्नेंस की व्यावहारिकता को नीतिगत चर्चाओं के केंद्र में ला दिया है।
आगे की प्रक्रिया टेक निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण होगी। यह देखना होगा कि क्या सरकार अनुपालन की समय-सीमाओं को समायोजित करती है या इंटरमीडियरीज के लिए अधिक लचीलापन लाती है। निवेशक इस बात पर भी नजर रखेंगे कि नियामकीय बदलावों का उन कंपनियों के परिचालन लागत और कानूनी जोखिम प्रोफाइल पर क्या असर पड़ता है जो यूजर-जनरेटेड कंटेंट पर बहुत अधिक निर्भर करती हैं।
