Microsoft पर अमेरिकी सरकार ने वीजा फ्रॉड के गंभीर आरोप लगाए हैं, जिसके बाद कंपनी ने पलटवार किया है। प्रेसिडेंट Brad Smith का कहना है कि सख्त इमिग्रेशन नीतियों से कंपनी की AI रिसर्च और टैलेंट हासिल करने की क्षमता पर असर पड़ सकता है, जो निवेशकों के लिए चिंता का विषय है।
आरोपों का जवाब और सफाई
अमेरिकी प्रशासन और Microsoft के बीच H-1B वीजा और ग्रीन कार्ड को लेकर विवाद गहरा गया है। सरकार ने कंपनी पर वीजा फ्रॉड का आरोप लगाया है, जिसके चलते कुछ कर्मचारियों के लिए परमानेंट रेजिडेंसी की प्रक्रिया को रोक दिया गया है। कंपनी के प्रेसिडेंट Brad Smith ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। उनका तर्क है कि सरकार कंपनी की हायरिंग प्रोसेस को समझ नहीं पा रही है। Smith के मुताबिक, पेंडिंग एप्लिकेशन नई भर्तियों की नहीं, बल्कि उन पुराने कर्मचारियों की हैं जो लंबे समय से प्रशासनिक बैकलॉग (backlog) में फंसे हैं।
निवेशकों की चिंता का कारण
शेयरधारकों के लिए सबसे बड़ी टेंशन AI क्षेत्र में कंपनी की पकड़ को लेकर है। Microsoft की कामयाबी में विदेशी विशेषज्ञों का बड़ा योगदान है। अगर वीजा नियमों में सख्ती बरकरार रहती है, तो कंपनी की हायरिंग कॉस्ट बढ़ सकती है और प्रमुख AI प्रोजेक्ट्स की टाइमलाइन में देरी होने का खतरा है। अपनी बात को मजबूती देने के लिए कंपनी ने बताया कि उसने पिछले साल 9,000 से ज्यादा अमेरिकी नागरिकों को नौकरी दी है, जिससे घरेलू स्तर पर भी भर्ती का संतुलन बना रहे।
भविष्य की चुनौतियां
यह मामला अब एक बड़े रेग्युलेटरी रिस्क (regulatory risk) में तब्दील हो चुका है। हालांकि Microsoft अभी भी सरकारी प्रोजेक्ट्स पर काम कर रही है, लेकिन वीजा विवाद ने कंपनी के कामकाज में अनिश्चितता पैदा कर दी है। निवेशक अब कंपनी के मैनेजमेंट की तरफ से आने वाली भविष्य की टिप्पणियों पर नजर बनाए हुए हैं, ताकि यह पता चल सके कि हायरिंग की रफ्तार और ऑपरेशनल खर्चों पर इसका कितना बुरा असर पड़ने वाला है।
