ट्रंप प्रशासन ने Microsoft को उस फेडरल प्रोग्राम से सस्पेंड कर दिया है, जो H-1B वीजा धारकों को ग्रीन कार्ड दिलाने में मदद करता है। कंपनी पर आरोप है कि उसने स्थानीय कर्मचारियों की जगह विदेशी कामगारों को रखा है। यह कदम टेक सेक्टर में सरकारी सख्ती का संकेत है।
ट्रंप प्रशासन के इस कड़े फैसले की घोषणा वाइस प्रेसिडेंट JD Vance ने 8 अक्टूबर, 2026 को की। जांच में सामने आया है कि कंपनी ने स्थानीय कर्मचारियों के मुकाबले विदेशी नागरिकों को करीब 1.5:1 के अनुपात में नियुक्त किया। यह कार्रवाई PERM (परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन) प्रोसेस के खिलाफ की गई है, जो अमेरिका में परमानेंट रेजिडेंसी के लिए एक अनिवार्य प्रक्रिया है।\n\n### सरकारी जांच का शिकंजा\nफेडरल अथॉरिटीज यह जांच कर रही हैं कि क्या कंपनी की भर्ती प्रक्रिया प्रोग्राम के नियमों का उल्लंघन है। सरकार का आरोप है कि इससे लोकल जॉब मार्केट पर बुरा असर पड़ा है। इस कदम से टेक सेक्टर में वर्कफोर्स मैनेजमेंट को लेकर सरकार की बढ़ती सख्ती साफ दिखाई दे रही है।\n\n### निवेशकों के लिए चुनौतियां\nयह फैसला हालिया सख्त नियमों की कड़ी का हिस्सा है। सितंबर 2026 में ही सरकार ने H-1B वीजा के लिए ले-ऑफ हिस्ट्री की स्क्रीनिंग अनिवार्य कर दी थी। इसके अलावा, OPT प्रोग्राम के तहत इंटरनेशनल स्टूडेंट्स पर $70,000 की फीस लगाने का प्रस्ताव भी दिया गया है।\n\nमार्केट जानकारों का मानना है कि इससे टेक दिग्गजों की ऑपरेशनल कॉस्ट बढ़ सकती है। यदि यह सख्ती अन्य कंपनियों पर भी लागू होती है, तो सेक्टर में रेगुलेटरी रिस्क और ज्यादा बढ़ सकता है। अब बाजार की नजर इस बात पर है कि क्या Microsoft इसके खिलाफ कानूनी कदम उठाती है या यह पूरी इंडस्ट्री के लिए एक नए और कठिन दौर की शुरुआत है।
