Meta ने Instagram और WhatsApp से विवादित कंटेंट को हटाया है। कंपनी के ऑटोमेटेड सेफ्टी सिस्टम में खामियों के बाद अब भारतीय अधिकारी कंपनी के 'पैसिव इंटरमीडियरी' दर्जे पर फिर से विचार कर रहे हैं, जिससे कंपनी पर कानूनी जोखिम बढ़ सकता है।
कानूनी दर्जे में बदलाव की आहट
निवेशकों के लिए सबसे बड़ी चिंता भारतीय अधिकारियों का Meta के कानूनी क्लासिफिकेशन को लेकर बदलता रुख है। अब तक टेक प्लेटफॉर्म्स भारत में IT Act के तहत 'पैसिव इंटरमीडियरी' (passive intermediary) के तौर पर काम कर रहे थे, जिससे उन्हें सेफ हार्बर प्रोटेक्शन (safe harbor protection) मिलता था। लेकिन, सरकार अब यह मान रही है कि Meta के एल्गोरिदम जिस तरह से कंटेंट को प्रमोट कर रहे हैं, उससे कंपनी एक 'एक्टिव कंटेंट क्यूरेटर' की तरह काम कर रही है।
अगर यह कानूनी दर्जा बदलता है, तो Meta अपनी सुरक्षा कवच खो सकती है। इसका मतलब है कि प्लेटफॉर्म पर मौजूद कंटेंट के लिए कंपनी सीधे तौर पर जवाबदेह होगी, जिससे भारी जुर्माना, कानूनी मुकदमे और कड़े सरकारी नियंत्रण का खतरा पैदा हो गया है।
कंप्लायंस का बढ़ेगा खर्च
जांच में पता चला है कि Meta के सिस्टम में कंटेंट रिमूवल की प्रक्रिया काफी धीमी और रिएक्टिव थी। कंपनी के एल्गोरिदम ने कीवर्ड-बेस्ड फिल्टर्स को बायपास करते हुए यूजर्स को आपत्तिजनक कंटेंट तक पहुंचाया। इस खामी को दूर करने के लिए Meta को अब AI-ड्रिवन टूल्स, ह्यूमन रिव्यू टीमों और स्थानीय कंप्लायंस इंफ्रास्ट्रक्चर पर अपना खर्च काफी बढ़ाना पड़ सकता है।
भविष्य में मार्जिन्स पर असर पड़ने की पूरी आशंका है, क्योंकि कड़े सरकारी नियमों के चलते कंपनी को ऑपरेशनल खर्च बढ़ाना होगा। निवेशकों को अब Ministry of Electronics and Information Technology (MeitY) की ओर से आने वाले नए दिशा-निर्देशों और IT Rules में बदलाव पर पैनी नजर रखनी होगी।
