सरकार का नया 'DEPA for AI Training' फ्रेमवर्क मुश्किलों में घिर गया है। जानकारों का कहना है कि यह डेटा पर यूजर का कंट्रोल छीनकर उसे संस्थाओं के हाथों में सौंप सकता है, जिससे प्राइवेसी और कॉरपोरेट गवर्नेंस पर सवाल उठ रहे हैं।
इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने हाल ही में 'Data Empowerment and Protection Architecture (DEPA) for AI Training' फ्रेमवर्क पेश किया है। सरकार का मकसद इसके जरिए भारत की GDP में AI से $500 बिलियन का योगदान हासिल करना है। हालांकि, कानूनी विशेषज्ञों और प्राइवेसी एडवोकेट्स ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी है, क्योंकि यह यूजर ऑटोनॉमी के बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ जा सकता है।
कंट्रोल किसके हाथ में?
विवाद की मुख्य वजह डेटा पर नियंत्रण है। पुराने DEPA मॉडल में डेटा पर पूरा अधिकार यूजर का होता था, लेकिन नया फ्रेमवर्क बैंकिंग और हेल्थकेयर जैसे संस्थानों को 'institutional fiduciaries' के तौर पर बड़ी पावर दे रहा है। आलोचकों का तर्क है कि अब व्यक्तिगत सहमति के बजाय संस्थानों के फैसले प्रभावी होंगे, जो AI ट्रेनिंग के स्केल पर जोखिम भरा है।
बैंकों और वित्तीय संस्थानों पर क्या असर होगा?
बैंकिंग और हेल्थकेयर सेक्टर की कंपनियों के लिए यह फ्रेमवर्क नई चुनौतियां लेकर आया है। डेटा क्यूरेशन की जिम्मेदारी मिलने पर इन कंपनियों को रेगुलेटरी स्क्रूटनी का सामना करना पड़ सकता है। इसमें डेटा प्राइवेसी और RBI के FREE-AI फ्रेमवर्क जैसे मानकों का पालन करना अनिवार्य होगा।
निवेशकों के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकार डेटा की जिम्मेदारी और मुनाफे की हिस्सेदारी को कैसे स्पष्ट करती है। फिलहाल, फ्रेमवर्क में डेटा ओनर्स को रॉयल्टी या लाभ देने का कोई प्रावधान नहीं है, जो भविष्य में पब्लिक ट्रस्ट और कॉरपोरेट गवर्नेंस के लिए चुनौती बन सकता है।
