क्वांटम कंप्यूटिंग लैब से निकलकर अब कमर्शियल इस्तेमाल की ओर बढ़ रही है। नए फोरकास्ट के मुताबिक, साल 2035 तक यह सेक्टर **$2.7 ट्रिलियन** की ग्लोबल वैल्यू पैदा कर सकता है।
भारी निवेश और बदलती दिशा
क्वांटम कंप्यूटिंग अब केवल कागजों या लैब तक सीमित नहीं है। साल 2024 में जहां इस सेक्टर में $2.5 बिलियन का निवेश था, वहीं 2025 में यह उछलकर $13.3 बिलियन तक पहुंच गया है। फार्मा और केमिकल जैसे सेक्टर सबसे पहले इससे फायदा उठाने की रेस में हैं।
ग्लोबल इंडस्ट्री रेवेन्यू, जो 2025 में $1 बिलियन के पार गया था, उसके 2028 तक $4.4 बिलियन होने का अनुमान है। जानकारों का मानना है कि 2035 तक हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर मिलाकर यह बाजार $100 बिलियन को छू सकता है।
चुनौतियां और रिस्क (Risks)
इतना बड़ा पोटेंशियल होने के बावजूद राह आसान नहीं है। कंपनियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्वांटम आर्किटेक्चर को स्केल करने और एक्सपर्ट टैलेंट की भारी कमी की है। साथ ही, सबसे बड़ा रिस्क साइबर सिक्योरिटी का है। क्वांटम पावर मौजूदा एन्क्रिप्शन (Encryption) स्टैंडर्ड्स को तोड़ने की क्षमता रखती है, जिससे ग्लोबल डेटा सुरक्षा पर खतरा मंडरा रहा है। इसका मतलब है कि भविष्य में कंपनियां केवल हार्डवेयर पर ही नहीं, बल्कि नई सिक्योरिटी प्रोटोकॉल पर भी भारी खर्च करेंगी।
भारतीय निवेशकों के लिए टेक-अवे
भारतीय IT सेक्टर के लिए यह एक बड़ा अवसर है। देश की बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियां पहले से ही रिसर्च लैब्स और पार्टनरशिप्स के जरिए इस बदलाव के लिए खुद को तैयार कर रही हैं। ये कंपनियां अपने ग्लोबल क्लाइंट्स को क्वांटम-एनेबल्ड साइबर खतरों से निपटने में मदद करेंगी। निवेशकों के लिए सलाह है कि वे देखें कि IT कंपनियां इस टेक्नोलॉजी को अपने सर्विस मॉडल में कितनी तेजी से जोड़ती हैं और इसका असर उनके बैलेंस शीट पर कैसा पड़ता है। फिलहाल, इसे शॉर्ट टर्म गेम के बजाय एक बड़े लॉन्ग टर्म थीम के रूप में देखना ही समझदारी है।
