DeFi को लगा झटका: हैकिंग के डर से बैंक हुए पीछे, खुद के ब्लॉकचेन बनाने पर जोर

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AuthorAditya Rao|Published at:
DeFi को लगा झटका: हैकिंग के डर से बैंक हुए पीछे, खुद के ब्लॉकचेन बनाने पर जोर
Overview

दुनिया भर के बड़े वित्तीय संस्थान अब ओपन-सोर्स DeFi प्रोटोकॉल से दूरी बना रहे हैं। इसकी मुख्य वजह सिस्टम में लगातार हो रही सुरक्षा खामियां और ब्रिज (Bridges) की कमजोरियां हैं। अब बैंक पब्लिक नेटवर्क के जोखिमों से बचने के लिए खुद के अनुमति-आधारित (Permissioned) ब्लॉकचेन इंफ्रास्ट्रक्चर पर काम कर रहे हैं।

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संस्थानों का बदलता रुख

पहले यह उम्मीद थी कि डीसेंट्रलाइज्ड फाइनेंस (DeFi) धीरे-धीरे पारंपरिक बैंकिंग सिस्टम में शामिल हो जाएगा, लेकिन अब यह धारणा टूटती दिख रही है। संस्थानों को पब्लिक DeFi नेटवर्क अब भरोसेमंद नहीं, बल्कि जोखिम भरे लगते हैं। सुरक्षा में सेंध लगने की लगातार घटनाओं के कारण, बड़ी वित्तीय संस्थाएं पब्लिक ब्लॉकचेन पर पैसा लगाने से कतरा रही हैं।

खुद का ब्लॉकचेन बनाम पब्लिक प्रोटोकॉल

Societe Generale Forge जैसी कंपनियां, जो बैंकों के ब्लॉकचेन प्रोजेक्ट्स में सबसे आगे हैं, अब पब्लिक चेन पर भरोसेमंद सेटलमेंट लेयर की कमी को दूर करने के लिए आगे आई हैं। उन्होंने EURCV और USDCV जैसे अपने खुद के स्टेबलकॉइन्स (Stablecoins) लॉन्च किए हैं। इससे यह साफ है कि बैंक अभी भी भरोसे और सेंट्रलाइज्ड कंट्रोल को प्राथमिकता दे रहे हैं। वे डीसेंट्रलाइज्ड और नॉन-कस्टोडियल (Non-custodial) तरीकों के बजाय, अपनी पुरानी व्यवस्था जैसे कस्टडी (Custody) और सेटलमेंट की निश्चितता चाहते हैं।

ब्रिज की कमजोरी एक बड़ा सिरदर्द

सिक्योरिटी ऑडिट्स में यह बात सामने आई है कि अलग-अलग ब्लॉकचेन के बीच एसेट ट्रांसफर करने वाले क्रॉस-चेन ब्रिज (Cross-chain Bridges) ही सबसे बड़े खतरे का जरिया बनते हैं। इन ब्रिज को सुरक्षित रखना बेहद जटिल है और मौजूदा डेवलपमेंट टीमें अक्सर इसमें नाकाम साबित हो रही हैं। नतीजतन, बार-बार इनमें से लिक्विडिटी (Liquidity) चोरी हो जाती है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि जब तक ये प्रोटोकॉल सुरक्षा से ज्यादा फीचर्स पर ध्यान देंगे, तब तक बड़े संस्थान इनमें निवेश नहीं करेंगे। ओपन-सोर्स कोड भले ही ट्रांसपेरेंसी (Transparency) के लिए अच्छा हो, लेकिन बड़े वित्तीय संस्थानों के लिए यह एक बड़ी चूक साबित हो रहा है।

डीसेंट्रलाइज्ड फाइनेंस में जोखिम

DeFi और संस्थानों की जरूरत के बीच सबसे बड़ी खाई यह है कि DeFi में गुमनाम (Pseudonymous) और बिना अनुमति (Permissionless) के काम होता है, जबकि बैंकों को एंटी-मनी लॉन्ड्रिंग (AML) और नो-योर-कस्टमर (KYC) जैसे सख्त नियमों का पालन करना होता है। स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट्स (Smart Contracts) में गलती होने पर नुकसान की भरपाई की कोई व्यवस्था नहीं है, जबकि पारंपरिक बैंकिंग में कानूनी मदद और बीमा उपलब्ध है। खासकर, उत्तर कोरिया जैसे देशों से जुड़े हैकिंग ग्रुप्स की संलिप्तता के कारण, यह मामला राष्ट्रीय सुरक्षा का भी बन गया है। इसी वजह से, बड़े संस्थान पब्लिक DeFi प्रोटोकॉल के साथ किसी भी तरह के जुड़ाव को एक बहुत बड़ा जोखिम मान रहे हैं, जिससे उनका DeFi में निवेश लगभग रुक गया है।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.