Infosys और TCS की नई रणनीति: AI-लेड इंजीनियरिंग का दांव, निवेशकों के लिए क्या हैं संकेत?

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
Infosys और TCS की नई रणनीति: AI-लेड इंजीनियरिंग का दांव, निवेशकों के लिए क्या हैं संकेत?

IT सेक्टर की दिग्गज कंपनियां जैसे Infosys और TCS अब 'Forward-Deployed Engineer' मॉडल अपना रही हैं। इसका मकसद क्लाइंट की टीमों के साथ सीधे जुड़कर काम करना है। निवेशकों के लिए यह जानना जरूरी है कि क्या यह बदलाव प्रॉफिट मार्जिन बढ़ाएगा या केवल ट्रेनिंग खर्च में इजाफा करेगा।

भारतीय आईटी कंपनियां अब अपने काम करने के तरीके में बड़ा बदलाव ला रही हैं। Infosys और Tata Consultancy Services जैसी कंपनियां अब 'Forward-Deployed Engineer' मॉडल पर शिफ्ट हो रही हैं। इस मॉडल में इंजीनियर्स केवल ऑफिस में बैठकर निर्देशों का इंतजार नहीं करेंगे, बल्कि वे क्लाइंट की टीम का हिस्सा बनकर सीधे समस्याओं को सुलझाएंगे।

लेबर आर्बिट्रेज से आगे की तैयारी

सालों तक भारतीय आईटी सेक्टर 'लेबर आर्बिट्रेज' (सस्ते श्रम) के मॉडल पर टिका रहा, जहां कंपनियों ने घंटों के हिसाब से बिलिंग करके ग्रोथ हासिल की। लेकिन AI के आने से बेसिक कोडिंग का काम आसान हो गया है, जिससे पुराने मॉडल पर दबाव बढ़ रहा है। अब ये कंपनियां खुद को केवल कोडिंग करने वाले सर्विस प्रोवाइडर से हटाकर बिजनेस प्रॉब्लम सॉल्विंग पार्टनर के तौर पर स्थापित करना चाहती हैं।

Infosys ने 6,000 'फ्रंटियर इंजीनियर्स' की टीम तैयार करने की घोषणा की है, जबकि Tata Consultancy Services लगभग 8,900 विशेषज्ञों का पूल बना रही है। LTIMindtree और Cognizant जैसी कंपनियां भी अपने कर्मचारियों को इस नई भूमिका के लिए तैयार कर रही हैं ताकि वे अधिक वैल्यू-एडेड काम कर सकें।

एग्जीक्यूशन और रिस्क

रणनीति साफ है, लेकिन इसे लागू करने में बड़े रिस्क भी हैं। इसे 'स्केलिंग पैराडॉक्स' कहा जा रहा है, क्योंकि हजारों लोगों को एक साथ ऐसी हाई-लेवल प्रॉब्लम सॉल्विंग स्किल सिखाना आसान नहीं है। सबसे बड़ा डर यह है कि कहीं कंपनियां पुराने रोल्स का नाम बदलकर ही न रह जाएं, जिससे ट्रेनिंग का खर्च तो बढ़ जाए लेकिन सर्विस की क्वालिटी में सुधार न दिखे।

साथ ही, ऐसे टैलेंट को ढूंढना भी मुश्किल है, जिनके पास कोडिंग के साथ-साथ बिजनेस की समझ और सोशल स्किल्स दोनों हों। हाई-स्किल टैलेंट की मांग बढ़ने से सैलरी कॉस्ट भी बढ़ सकती है, जो कंपनियों के नेट प्रॉफिट मार्जिन पर असर डाल सकती है।

निवेशकों को क्या देखना चाहिए?

शेयरहोल्डर्स को आने वाली तिमाहियों में कंपनियों के मार्जिन और कॉन्ट्रैक्ट वैल्यू पर बारीकी से नजर रखनी चाहिए। क्या यह निवेश बेहतर बिजनेस आउटकम में बदल रहा है या सिर्फ खर्च बढ़ा रहा है? कंपनी के लॉन्ग-टर्म ग्रोथ के लिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या वे क्लाइंट्स की उम्मीदों पर खरा उतर पा रही हैं या नहीं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.