Sovereign AI: Fintech Fest में दिग्गज कंपनियों की मांग, डेटा स्टोरेज से आगे बढ़कर तैयार करें अपना AI इकोसिस्टम

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AuthorMehul Desai|Published at:
Sovereign AI: Fintech Fest में दिग्गज कंपनियों की मांग, डेटा स्टोरेज से आगे बढ़कर तैयार करें अपना AI इकोसिस्टम

Global Fintech Fest 2026 में इंडस्ट्री लीडर्स ने साफ कर दिया है कि भारत को अब सिर्फ डेटा स्टोरेज तक सीमित नहीं रहना चाहिए। टेक्नोलॉजी स्टैक पर पूरी तरह कंट्रोल पाने के लिए भारी निवेश और लोकल AI मॉडल्स की जरूरत है ताकि विदेशी आर्किटेक्चर पर निर्भरता खत्म हो सके।

मुंबई में आयोजित Global Fintech Fest 2026 में देश के टॉप डिजिटल और टेलीकॉम दिग्गजों ने भारत की सोवरेन AI (Sovereign AI) स्ट्रैटेजी को पूरी तरह बदलने की मांग की है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि केवल डेटा को भारत की सीमाओं के अंदर रखने (डेटा रेजिडेंसी) से काम नहीं चलेगा। अब हमें हार्डवेयर से लेकर फाउंडेशनल मॉडल्स तक, पूरी टेक्नोलॉजी स्टैक पर अपना मालिकाना हक चाहिए।\n\n### इंफ्रास्ट्रक्चर और कैपिटल का बड़ा गैप\n\nYotta Data Services के CEO सुनील गुप्ता ने साफ किया कि भारत की AI महत्वाकांक्षाओं में सबसे बड़ी बाधा कंप्यूटिंग पावर के लिए जरूरी भारी-भरकम पूंजी है। एक सोवरेन AI इकोसिस्टम बनाने के लिए सिर्फ कोडिंग काफी नहीं है, इसके लिए डेटा सेंटर्स, एनर्जी सप्लाई और हाई-परफॉर्मेंस GPU क्लस्टर्स में ₹अरबों का निवेश चाहिए। इंडस्ट्री का मानना है कि भारतीय कैपिटल मार्केट को अब इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े इस रिस्क को लेने के लिए तैयार होना होगा, वरना हम ग्लोबल टेक दिग्गजों से काफी पीछे रह जाएंगे।\n\n### सोवरेन AI के पांच स्तंभ\n\nBharti Airtel के ग्रुप चीफ रेगुलेटरी ऑफिसर राहुल वट्स ने क्लाउड और AI सोवरेनिटी के लिए एक नया फ्रेमवर्क पेश किया है। उन्होंने बताया कि असली स्वायत्तता पांच स्तंभों पर टिकी है: डेटा रेजिडेंसी, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर पर कंट्रोल, ऑपरेशनल इंडिपेंडेंस, ज्यूरिसडिक्शन क्लेरिटी और टेक्नोलॉजी सोवरेनिटी। फिलहाल भारत तकनीकी संप्रभुता (Technological Sovereignty) के मामले में पीछे है, क्योंकि हम विदेशी मॉडल्स पर निर्भर हैं।\n\n### लोकल AI मॉडल्स क्यों हैं जरूरी?\n\nBharatGen के CEO ऋषि बल ने बताया कि वेस्टर्न-सेंट्रिक मॉडल्स न केवल महंगे हैं, बल्कि भाषाई रूप से कम कुशल भी हैं। ये मॉडल्स अक्सर अंग्रेजी डेटा पर ट्रेन होते हैं, जिससे भारतीय भाषाओं को प्रोसेस करने में ज्यादा कंप्यूटेशनल पावर लगती है और कंपनियों का खर्च बढ़ जाता है।\n\nइस समस्या को हल करने के लिए सरकार का 'Param 2' (17-बिलियन पैरामीटर वाला मल्टीलिंगुअल फाउंडेशन मॉडल) एक गेम चेंजर साबित हो सकता है। यह न केवल सिक्योरिटी और कंप्लायंस बनाए रखने में मदद करेगा, बल्कि विदेशी प्लेटफॉर्म्स पर निर्भरता कम करके खर्च भी घटाएगा।\n\n### निवेशकों के लिए क्या है ट्रैक करने वाली बात?\n\nइस बदलाव में मौके भी हैं और चुनौतियां भी। निवेशकों को यह देखना होगा कि घरेलू कंप्यूट इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास कैसे होता है और बड़ी कंपनियां स्थानीय मॉडल्स को कितनी तेजी से अपनाती हैं। आगे चलकर सरकार का फोकस सॉफ्टवेयर से हटकर हार्डवेयर और सेमीकंडक्टर इंफ्रास्ट्रक्चर की तरफ शिफ्ट होता है या नहीं, यह इस सेक्टर के भविष्य की दिशा तय करेगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.