भारत ने सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग को बूस्ट देने के लिए 'Semicon India 2.0' प्रोग्राम के तहत **₹1.27 लाख करोड़** के बड़े पैकेज को मंजूरी दी है। Tata Electronics के नेतृत्व में शुरू हो रहे इन मेगा प्रोजेक्ट्स का मकसद **$50 बिलियन** के घरेलू बाजार पर कब्जा जमाना है, लेकिन जानकारों का मानना है कि इसमें बड़े 'एग्जीक्यूशन रिस्क' भी जुड़े हैं।
भारत अब ग्लोबल टेक्नोलॉजी का सिर्फ कंज्यूमर नहीं, बल्कि मैन्युफैक्चरर बनने की राह पर तेजी से आगे बढ़ रहा है। जुलाई 2026 में मंजूरी मिलने के बाद ₹1,27,500 करोड़ के 'Semicon India 2.0' प्रोग्राम ने चिप इम्पोर्ट पर निर्भरता कम करने का लक्ष्य रखा है, जिसने पिछले कुछ सालों में देश को भारी विदेशी मुद्रा का नुकसान पहुंचाया है।
धोलेरा में बनेगा भारत का भविष्य
गुजरात के धोलेरा में बन रहा सेमीकंडक्टर प्लांट इस सेक्टर का मुख्य केंद्र है। Tata Electronics और ताइवान की PSMC मिलकर इस प्रोजेक्ट में ₹91,000 करोड़ का भारी-भरकम निवेश कर रहे हैं। इस प्लांट में दिसंबर 2026 तक पहली सिलिकॉन प्रोडक्शन का लक्ष्य रखा गया है। इसके अलावा, Applied Materials ने अगले एक दशक में $5 बिलियन और Lam Research ने लगभग ₹10,000 करोड़ के निवेश की प्रतिबद्धता जताई है।
निवेशकों के लिए चेतावनी (Investment Risks)
भारत का सेमीकंडक्टर मार्केट 2026 में $50 बिलियन होने का अनुमान है, जो 2030 तक बढ़कर $110 बिलियन तक जा सकता है। हालांकि, निवेशकों को ध्यान रखना चाहिए कि 'फैब' (Fab) यूनिट्स बनाना बेहद महंगा और जटिल काम है।
मुख्य जोखिम:
- एग्जीक्यूशन रिस्क: ताइवान या दक्षिण कोरिया जैसे देशों के मुकाबले भारत में अभी वैसी सप्लाई चेन और स्किल-सेट विकसित नहीं है।
- कॉस्ट ओवररन्स: निर्माण या कमीशनिंग में देरी से प्रोजेक्ट की लागत बढ़ सकती है, जिसका असर कंपनियों के रिटर्न्स पर पड़ेगा।
- कैपिटल स्टेबिलिटी: यह लंबी अवधि का खेल है। कंपनियों को भारी शुरुआती खर्च के साथ-साथ रिसर्च और मैन्युफैक्चरिंग कैपेबिलिटी बनाने में कई साल लगेंगे।
फिलहाल, निवेशकों को धोलेरा प्लांट की कमीशनिंग डेट और सरकार के अगले अपडेट्स पर बारीक नजर रखनी चाहिए, क्योंकि यही इस पूरे बदलाव की सफलता का पैमाना तय करेंगे।
