AI Data Centre: भारत में **$300 बिलियन** का निवेश, लेकिन डेटा सेंटर की मांग में है बड़ी गिरावट

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
AI Data Centre: भारत में **$300 बिलियन** का निवेश, लेकिन डेटा सेंटर की मांग में है बड़ी गिरावट

भारत में AI डेटा सेंटर के लिए **$300 बिलियन** की भारी-भरकम राशि का कमिटमेंट तो आ गया है, लेकिन डिमांड और सप्लाई का गणित अभी भी बिगड़ा हुआ है। GPU यूटिलाइजेशन सिर्फ **20%** के आसपास है, जिससे लॉन्ग-टर्म रिटर्न और जॉब क्रिएशन को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

भारत अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए ग्लोबल हब बनने की ओर कदम बढ़ा रहा है, लेकिन हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। देश में डेटा सेंटर्स के लिए $300 बिलियन से ज्यादा की पूंजी का वादा किया गया है और 2030 तक 5 से 10 गीगावाट क्षमता का लक्ष्य रखा गया है। हालांकि, Rhodium Group की हालिया रिपोर्ट बताती है कि सप्लाई के मुकाबले मांग काफी कम है। सरकार के 'IndiaAI Mission' के तहत मिल रही सब्सिडी के बावजूद GPU का इस्तेमाल केवल 20% के स्तर पर ही अटका हुआ है।

IT कंपनियों की अलग-अलग राह

डिमांड-सप्लाई के इस अंतर ने देश की प्रमुख IT कंपनियों के लिए राहें जुदा कर दी हैं। Tata Consultancy Services (TCS) अब 'एसेट-हैवी' (Asset-heavy) मॉडल पर चल रही है। कंपनी ने 1 गीगावाट क्षमता के साथ 'HyperVault' की शुरुआत की है, जिसके तहत कंपनी फिजिकल इंफ्रास्ट्रक्चर और हार्डवेयर लेयर पर बड़ा दांव लगा रही है। वहीं दूसरी ओर, Infosys ने 'एसेट-लाइट' (Asset-light) मॉडल को चुना है। कंपनी फिजिकल निवेश से बचकर कैपिटल डिसिप्लिन बनाए रखने और सॉफ्टवेयर-इंटीग्रेशन पर ध्यान केंद्रित कर रही है।

जॉब क्रिएशन और संसाधनों का संकट

डेटा सेंटर्स को लेकर किए गए बड़े-बड़े वादे अब सवालों के घेरे में हैं। राज्य सरकारों ने बड़े पैमाने पर रोजगार के वादे के साथ इंसेंटिव दिए थे, लेकिन सच्चाई यह है कि डेटा सेंटर में ऑटोमेशन ज्यादा होने के कारण मैनपॉवर की जरूरत काफी कम है। इसके अलावा, जिन इलाकों में ये सेंटर बनाए जा रहे हैं, वहां पानी की कमी जैसे पर्यावरणीय मुद्दे भविष्य में रेगुलेटरी रुकावटें पैदा कर सकते हैं।

'डिजिटल एक्सपोर्ट' का जोखिम

मौजूदा स्थिति यह है कि भारत में ऑपरेशनल डेटा सेंटर कैपेसिटी का लगभग 60% हिस्सा विदेशी कंपनियों और ग्लोबल क्लाइंट्स के पास है। यह एक 'डिजिटल एक्सपोर्ट एनक्लेव' (Digital Export Enclave) जैसा बनता जा रहा है, क्योंकि घरेलू स्तर पर अभी वैसी मांग नहीं दिख रही है। निवेशकों के लिए अगले कुछ क्वार्टर यह देखना अहम होगा कि कंपनियां अपनी कैपेसिटी को कैसे भरती हैं और क्या घरेलू बिजनेस इन सेवाओं को अपनाने में तेजी दिखाते हैं या नहीं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.