भारत में AI-रेडी डेटा सेंटर्स के लिए ग्लोबल और लोकल कंपनियां **$100 बिलियन** का बड़ा निवेश कर रही हैं। यह डिजिटल हब बनने की दौड़ में एक बड़ा कदम है, लेकिन पावर की कमी और हाई ऑपरेशनल लागत जैसे जोखिमों पर निवेशकों को नजर रखनी होगी।
भारत के डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर में एक बड़ा बदलाव आ रहा है। दिग्गज टेक कंपनियां और लोकल ऑपरेटर्स मिलकर $100 बिलियन का निवेश कर रहे हैं, ताकि देश में अत्याधुनिक AI-रेडी डेटा सेंटर्स खड़े किए जा सकें। ये सेंटर्स पुराने डेटा सेंटर्स से बिल्कुल अलग हैं, जिन्हें खास तौर पर एक्स्ट्रा-ऑर्डिनरी कंप्यूटिंग पावर के लिए तैयार किया गया है।\n\n### पावर की खपत में भारी उछाल\nइस बदलाव का सबसे बड़ा असर पावर सेक्टर पर पड़ा है। पारंपरिक सर्वर रैक को जहाँ 5 से 10 kW बिजली की जरूरत होती थी, वहीं नए AI-फोकस्ड रैक को 250 kW तक पावर चाहिए। यह बिजली की मांग पावर कंपनियों और रिन्यूएबल एनर्जी सप्लायर्स के लिए तो बड़ा मौका है, लेकिन डेटा सेंटर कंपनियों के लिए यह एक चुनौती भी है। अगर ग्रिड से 24x7 बिजली नहीं मिली, तो ऑपरेशनल लागत बढ़ेगी और मार्जिन पर दबाव आएगा।\n\n### सरकारी पॉलिसी का सपोर्ट\nनिवेशकों के लिए अच्छी खबर यह है कि सरकार ने डेटा सेंटर्स को 'इंफ्रास्ट्रक्चर स्टेटस' दिया है, जिससे कंपनियों को आसानी से और सस्ते में लोन मिल पा रहा है। इसके अलावा, Digital Personal Data Protection Act और RBI के नियमों के कारण डेटा का लोकल स्टोरेज अनिवार्य हो गया है, जिससे इन डेटा सेंटर्स की मांग फिक्स हो गई है।\n\n### विस्तार की रणनीति और चुनौतियां\nGoogle, Microsoft और Amazon Web Services जैसी कंपनियां मुंबई, हैदराबाद और विशाखापत्तनम जैसे शहरों में अपना विस्तार कर रही हैं। वहीं, CtrlS Datacenters और CapitaLand जैसे नाम अब पटना और बोध गया जैसे छोटे शहरों तक भी पहुंच रहे हैं। हालांकि, टियर-2 शहरों में हाई-टेक फैसिलिटी को मैनेज करना, स्किल्ड वर्कफोर्स और बिजली की निरंतर आपूर्ति बनाए रखना एक कठिन काम होगा।\n\nनिवेशकों को प्रोजेक्ट की समयसीमा और पावर यूटिलिटी की क्षमता पर नजर रखनी चाहिए। लंबी अवधि में सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि भारत सिर्फ डेटा स्टोर करने वाला देश बनकर न रह जाए, बल्कि खुद के AI एप्लीकेशन्स भी विकसित कर सके।
