India Semiconductor Sector: बड़ी चुनौती! विदेशी मशीनों पर निर्भरता, स्किल्ड वर्कर्स की कमी

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AuthorMehul Desai|Published at:
India Semiconductor Sector: बड़ी चुनौती! विदेशी मशीनों पर निर्भरता, स्किल्ड वर्कर्स की कमी

भारत अपने सेमीकंडक्टर सेक्टर को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है, खासकर असेंबली और टेस्टिंग पर फोकस करते हुए। लेकिन, विदेशी उपकरणों पर भारी निर्भरता एक बड़ी रुकावट बनी हुई है। सफलता काफी हद तक कुशल वर्कफोर्स तैयार करने पर निर्भर करेगी, जो Micron के Sanand प्लांट जैसी सुविधाओं को सपोर्ट कर सके।

सेमीकंडक्टर सेक्टर में भारत की राह में रोड़े

भारत एक मजबूत सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग बेस बनाने की दिशा में काम कर रहा है, लेकिन इस सफर में कई बड़ी व्यावहारिक मुश्किलें सामने आ रही हैं। Equirus Securities के एक हालिया विश्लेषण से पता चलता है कि सरकार की रणनीति तो अच्छी है, लेकिन देश अभी भी विदेशी उपकरणों पर बहुत ज़्यादा निर्भर है। हकीकत यह है कि इन हाई-टेक सुविधाओं के लिए ज़रूरी 90% से ज़्यादा मशीनरी और टूल्स बाहर से मंगाने पड़ते हैं, जिससे ग्लोबल सप्लाई चेन पर निर्भरता काफी बढ़ जाती है।

असेंबली और मैच्योर टेक्नोलॉजी पर फोकस

भारत का नज़रिया Outsourced Semiconductor Assembly and Test (OSAT) सर्विसेज और 28nm से 110nm तक के मैच्योर मैन्युफैक्चरिंग नोड्स पर केंद्रित है। यह एक प्रैक्टिकल कदम है, क्योंकि इन सेगमेंट्स में फिलहाल ऑटोमोटिव, इंडस्ट्रियल और कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स की ग्लोबल डिमांड का एक बड़ा हिस्सा आता है। इन क्षेत्रों को टारगेट करके, भारत महंगा इम्पोर्ट डोमेस्टिक प्रोडक्शन से बदलना चाहता है। लक्ष्य एक ऐसे मार्केट का निर्माण करना है जहां 2031 तक डोमेस्टिक चिप की खपत $155 बिलियन को पार करने का अनुमान है।

वर्कफोर्स की जरूरतें और ट्रेनिंग लक्ष्य

जहां भारत में करीब तीन लाख चिप डिज़ाइनर्स का एक विशाल पूल है, वहीं विशेष मैन्युफैक्चरिंग टैलेंट की साफ कमी है। इंडस्ट्री को प्रोसेस इंजीनियर्स, यील्ड इंजीनियर्स, मेट्रोलॉजी स्पेशलिस्ट्स और टेक्नीशियन्स की ज़रूरत है जो स्टेराइल क्लीनरूम एनवायरनमेंट में काम करने में सहज हों। इस गैप को पाटने के लिए, देश 2027 तक 85,000 इंडस्ट्री-रेडी इंजीनियर्स को ट्रेन करने का एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य लेकर चल रहा है। गुजरात के Sanand में Micron की सुविधा में हो रही प्रगति को इस बात का एक अहम बेंचमार्क माना जा रहा है कि देश इस वर्कफोर्स को कितनी अच्छी तरह स्केल कर पाता है।

ग्लोबल मॉडल्स से सीख

भारत के मौजूदा पॉलिसी फ्रेमवर्क में अन्य एशियाई देशों के सफल मॉडल्स से प्रेरणा ली गई है। इसमें ताइवान के सरकारी सपोर्ट वाले रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) जैसे तत्व शामिल हैं, मलेशिया में देखे गए फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (FDI) पर फोकस, और सिंगापुर द्वारा अपनाई गई कैपिटल डिसिप्लिन। हालांकि, इन योजनाओं की अंतिम सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि लोकल सप्लाई चेन कितनी जल्दी मैच्योर हो पाती है। इक्विपमेंट के अलावा, इस सेक्टर को स्पेशियलिटी केमिकल्स और गैसों की भी लगातार सप्लाई चाहिए, जिनमें से ज़्यादातर फिलहाल बाहर से मंगवाई जाती हैं। निवेशकों के लिए, इस सेक्टर की लॉन्ग-टर्म क्षमता इस बात से जुड़ी है कि कंपनियां इन प्रोजेक्ट्स को कितनी प्रभावी ढंग से एक्सेक्यूट करती हैं, डिज़ाइन से फुल-स्केल मैन्युफैक्चरिंग तक के ट्रांज़िशन को मैनेज करती हैं, और लोकल कैपेसिटी बिल्डिंग के ज़रिए धीरे-धीरे इम्पोर्ट की लागत को कम करती हैं।

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