भारत अब सिर्फ चिप डिजाइनिंग तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि 'Semicon 2.0' के तहत फुल-स्टैक मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम तैयार करने की तैयारी है। इस मिशन के लिए **₹1 लाख करोड़** का निवेश दांव पर लगा है, जो भारत को ग्लोबल सप्लाई चेन में एक पावरहाउस बनाने का लक्ष्य रखता है।
मैन्युफैक्चरिंग हब बनने की ओर भारत
भारत अब अपनी सेमीकंडक्टर रणनीति को पूरी तरह बदल रहा है। अब तक हम केवल डिजाइनिंग और असेंबली पर निर्भर थे, लेकिन अब सरकार ₹1 लाख करोड़ के कमिटमेंट के साथ 'Semicon 2.0' की ओर बढ़ रही है। इसका मुख्य फोकस चिप फैब्रिकेशन, एडवांस्ड पैकेजिंग, R&D और प्रिसिजन इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरिंग पर है।
ग्लोबल कंपनियों का बढ़ता रुझान
Applied Materials और Lam Research जैसी दिग्गज ग्लोबल कंपनियां पहले ही भारत में अपने R&D और कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग सेंटर खोलने का ऐलान कर चुकी हैं। यह बदलाव इसलिए भी जरूरी है क्योंकि कस्टम सिलिकॉन की मांग 2029-30 तक करीब USD 90 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान है। यह सेक्टर अब ऑटोमोटिव और टेलिकॉम जैसी इंडस्ट्रीज की बैकबोन बनने जा रहा है।
AI का तड़का और चुनौतियां
इस मिशन में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) एक 'फोर्स मल्टीप्लायर' का काम कर रही है। HCLTech जैसी कंपनियां चिप डिजाइनिंग की रफ्तार बढ़ाने के लिए AI-असिस्टेड वर्कफ्लो का इस्तेमाल कर रही हैं। हालांकि, राह आसान नहीं है। सबसे बड़ी चुनौती है कुशल मैनपावर की कमी। भारत के पास डिजाइन इंजीनियर्स की अच्छी फौज है, लेकिन क्लीन-रूम ऑपरेशन्स और फैक्ट्री-फ्लोर की बारीकियों के लिए हमें अभी लंबी दूरी तय करनी है।
निवेशकों के लिए क्या है खास?
निवेशकों को इन प्रोजेक्ट्स की सफलता और उनकी टाइमलाइन पर नजर रखनी चाहिए। यह सेक्टर काफी कैपिटल-इंटेन्सिव है और ग्लोबल सेमीकंडक्टर साइकल की वोलेटिलिटी का इस पर सीधा असर पड़ता है। सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि भारत कितनी जल्दी रॉ मटेरियल की लोकल सप्लाई चेन तैयार कर पाता है और नई फैब्रिकेशन यूनिट्स कितनी जल्दी अपना काम शुरू कर पाती हैं।
