भारत में डिजिटल फ्रॉड का खतरा तेजी से बढ़ रहा है। 2025 में यह दर बढ़कर **7.1%** तक पहुंच गई है, जो वैश्विक औसत **3.8%** से लगभग दोगुना है। यह स्थिति लिस्टेड कंपनियों के लिए नए जोखिम पैदा कर रही है।
क्या हुआ है?
हालिया ट्रांसयूनियन H1 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में संदिग्ध डिजिटल फ्रॉड के मामलों में भारी बढ़ोतरी देखी गई है। 2025 में यह दर बढ़कर 7.1% हो गई है, जो वैश्विक औसत 3.8% से काफी ज्यादा है। खास बात यह है कि फ्रॉड करने वाले अब पेमेंट स्कैम से हटकर 'अकाउंट लॉगिन' पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। लगभग 3.9% लॉगिन ट्रांजैक्शन को फ्रॉड पाया गया है। इसका मतलब है कि साइबर अपराधी मौजूदा अकाउंट्स में अनधिकृत एक्सेस के लिए यूजर की पहचान चुराने को प्राथमिकता दे रहे हैं।
निवेशकों के लिए यह क्यों मायने रखता है?
निवेशकों के लिए, डिजिटल फ्रॉड का यह बढ़ना सिर्फ एक तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि एक बड़ा व्यावसायिक और वित्तीय मुद्दा है। जब संवेदनशील क्षेत्रों की कंपनियां ज्यादा फ्रॉड का सामना करती हैं, तो उन्हें साइबर सुरक्षा, फ्रॉड डिटेक्शन सिस्टम और कस्टमर वेरिफिकेशन प्रक्रियाओं पर अपना खर्च बढ़ाना पड़ता है। यह सीधे तौर पर कंपनी के ऑपरेटिंग खर्चों को बढ़ाता है और प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव डाल सकता है। इसके अलावा, अपनी डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को सुरक्षित रखने में विफल रहने वाली कंपनियां ग्राहकों का भरोसा खो सकती हैं, जिससे कंपनी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंच सकता है और लंबी अवधि में बाजार हिस्सेदारी कम हो सकती है। मजबूत पहचान सत्यापन और सुरक्षित अकाउंट एक्सेस की आवश्यकता भारतीय व्यवसायों के लिए ऑपरेशनल रेजिलिएंस का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई है।
सेक्टर-विशिष्ट जोखिम
आंकड़े बताते हैं कि लॉजिस्टिक्स, टेलीकम्युनिकेशंस और इंश्योरेंस सेक्टर सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। लॉजिस्टिक्स फर्मों में फ्रॉड की दर 16.3% दर्ज की गई, इसके बाद टेलीकम्युनिकेशंस में 14.7% और इंश्योरेंस में 11.5% रही। ये उद्योग विशेष रूप से कमजोर हैं क्योंकि वे बड़ी मात्रा में रियल-टाइम ट्रांजैक्शन को संभालते हैं और उनके नेटवर्क काफी बड़े होते हैं। इन सेक्टरों में निवेशकों के लिए, फ्रॉड की रोकथाम अब वैकल्पिक नहीं है, बल्कि बिजनेस मॉडल का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। जो कंपनियां सुरक्षा में पर्याप्त निवेश नहीं करेंगी, उन्हें बढ़ते खतरों से निपटने के लिए नियामक दंड या ऑपरेशनल बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है।
रेगुलेटरी और कंप्लायंस का बोझ
फ्रॉड की सीधी लागत के अलावा, कंपनियां सख्त नियामक माहौल का भी सामना कर रही हैं। भारतीय सरकार साइबर जोखिमों को कम करने के लिए सक्रिय रूप से नियम कस रही है, जैसे कि टेलीकम्युनिकेशंस (टेलीकॉम साइबर सिक्योरिटी) रूल्स, 2024 और उसके बाद के संशोधन। इन नियमों के तहत सख्त अनुपालन, साइबर सुरक्षा ऑडिट और पहचान के दुरुपयोग को रोकने के लिए मोबाइल नंबर वैलिडेशन प्लेटफॉर्म जैसे उन्नत फ्रेमवर्क लागू करना अनिवार्य है। जबकि ये उपाय डिजिटल इकोसिस्टम की सुरक्षा के लिए डिज़ाइन किए गए हैं, वे कंपनियों पर 'कंप्लायंस की लागत' भी डालते हैं। निवेशकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि नियामक जांच बढ़ रही है, और जो कंपनियां साइबर सुरक्षा अनुपालन में सबसे आगे हैं, उन्हें उन कंपनियों पर प्रतिस्पर्धात्मक लाभ हो सकता है जो केवल प्रतिक्रियात्मक हैं।
निवेशकों को क्या ट्रैक करना चाहिए?
जैसे-जैसे डिजिटल फ्रॉड का विकास जारी है, निवेशकों के लिए कंपनी के डिस्क्लोजर में कुछ प्रमुख क्षेत्रों की निगरानी करना उपयोगी हो सकता है। सबसे पहले, मैनेजमेंट की ओर से साइबर सुरक्षा खर्च पर टिप्पणी देखें। क्या कंपनी अपनी कैपिटल एक्सपेंडिचर योजनाओं के हिस्से के रूप में एडवांस्ड फ्रॉड डिटेक्शन में निवेश कर रही है? दूसरा, डिजिटल कंप्लायंस या डेटा सुरक्षा से संबंधित बढ़ते ऑपरेशनल खर्चों के किसी भी संकेत पर नजर रखें। अंत में, इंडस्ट्री-व्यापी विकास पर ध्यान दें; यदि कोई विशेष सेक्टर धोखाधड़ी से संबंधित नियामक कार्रवाई की लहर का सामना करता है, तो प्रभावित कंपनियों को अल्पकालिक अस्थिरता या उनके बॉटम लाइनों पर दबाव का सामना करना पड़ सकता है। ग्राहक डेटा को सुरक्षित रखते हुए सुचारू यूजर अनुभव बनाए रखने की कंपनी की क्षमता तेजी से लंबी अवधि के स्थायी विकास के लिए एक प्रमुख मीट्रिक बनती जा रही है।
