ONDC की नई चाल: भारत ने ग्लोबल AI मार्केटप्लेस को दी चुनौती

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
ONDC की नई चाल: भारत ने ग्लोबल AI मार्केटप्लेस को दी चुनौती

भारत अपने ओपन डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, जैसे ONDC और Beckn प्रोटोकॉल को, प्राइवेट और क्लोज्ड AI प्लेटफॉर्म्स के विकल्प के तौर पर पेश कर रहा है। इंटरऑपरेबिलिटी को बढ़ावा देकर, यह मॉडल ट्रांजेक्शन कॉस्ट को कम करने और ग्लोबल ई-कॉमर्स दिग्गजों के दबदबे को तोड़ने का लक्ष्य रखता है, हालांकि इसे कड़ी प्रतिस्पर्धा और रेगुलेटरी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।

भारत का डिजिटल कॉमर्स में नया दांव

भारत अपनी डिजिटल कॉमर्स रणनीति में एक बड़ा बदलाव ला रहा है। देश अब बंद, प्राइवेट सिस्टम ('वॉल्ड गार्डन') के बजाय ओपन-सोर्स, इंटरऑपरेबल इंफ्रास्ट्रक्चर को प्राथमिकता दे रहा है। जहां दुनिया की बड़ी टेक कंपनियां AI-इंटीग्रेटेड मार्केटप्लेस बना रही हैं, वहीं भारत यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) के अनुभव का उपयोग करते हुए ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स (ONDC) और Beckn प्रोटोकॉल के ज़रिए इसे रिटेल कॉमर्स में ला रहा है।

ई-कॉमर्स को कैसे मिलेगा बढ़ावा?

इस डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर का मुख्य उद्देश्य ई-कॉमर्स को डेमोक्रेटाइज करना है। अभी कई बड़े प्लेटफॉर्म्स सेंट्रलाइज्ड सिस्टम की तरह काम करते हैं, जहां ग्राहक और व्यापारी एक ही इकोसिस्टम में फंसे रहते हैं। ये प्लेटफॉर्म्स अक्सर 5% से लेकर 45% तक कमीशन वसूलते हैं। इसके विपरीत, Beckn प्रोटोकॉल द्वारा संचालित ओपन-नेटवर्क का लक्ष्य प्रोडक्ट की खोज, ऑर्डर और डिलीवरी के तरीके को स्टैंडर्डाइज करना है, जिससे ट्रांजेक्शन कॉस्ट को 2% से 5% की रेंज में लाया जा सके। इस इंटरऑपरेबिलिटी से अलग-अलग एप्लीकेशन्स - चाहे वह छोटा लॉजिस्टिक्स प्रोवाइडर हो, लोकल किराना ऐप हो, या बड़ा प्रोक्योरमेंट प्लेटफॉर्म - आपस में जुड़ सकते हैं, जिससे छोटे व्यापारियों के लिए मार्केट एक्सेस बढ़ेगा।

क्या हैं राह की मुश्किलें?

बाजार हिस्सेदारी में बदलाव लाना आसान नहीं है। स्थापित ग्लोबल मार्केटप्लेस के पास भारी फंड, एडवांस AI मॉडल और ग्राहकों की वफादारी जैसे बड़े फायदे हैं। इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स के लिए एक बड़ी चिंता यह है कि भारत में फ्रंटियर AI टैलेंट और रिस्क कैपिटल की कमी हो सकती है, जिससे देश की एडवांस्ड AI एजेंट्स को ग्लोबल प्लेयर्स की रफ़्तार से बनाने और स्केल करने की क्षमता सीमित हो सकती है। इसके अलावा, छोटे व्यवसायों को इस एक्सपेरिमेंटल इंफ्रास्ट्रक्चर को इंटीग्रेट करना, स्थापित, भले ही बंद, इकोसिस्टम के प्लग-एंड-प्ले फीचर्स का उपयोग करने की तुलना में अधिक जटिल लग सकता है।

रेगुलेटरी और एग्जीक्यूशन रिस्क

इस पहल पर रेगुलेटरी और एग्जीक्यूशन से जुड़े जोखिम भी मंडरा रहे हैं। इंडस्ट्री वर्तमान में CLARITY Act जैसे घटनाक्रमों पर नज़र रख रही है, जो स्टैंडर्डाइज्ड AI एजेंट आइडेंटिटी और कंप्लायंस फ्रेमवर्क के संबंध में अनिश्चितता को उजागर करता है। निवेशकों और ऑब्जर्वर्स को अच्छी फंडिंग वाली विदेशी कंपनियों से कॉम्पिटिटिव प्रेशर पर भी ध्यान देना चाहिए, जो 2030 तक कुल ई-कॉमर्स ट्रांजेक्शन का 25% कैप्चर करने के नेटवर्क के लॉन्ग-टर्म लक्ष्य के लिए एक बड़ी बाधा बनी हुई है। सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि नेटवर्क स्केलिंग के दौरान एक रिलाएबल यूजर एक्सपीरियंस बनाए रख पाता है या नहीं, क्योंकि मौजूदा प्लेटफॉर्म्स की तुलना में सर्विस क्वालिटी में कोई भी कमी प्राइस-सेंसिटिव भारतीय ग्राहकों के बीच एडॉप्शन को धीमा कर सकती है।

आगे क्या?

बाजार के लिए मुख्य मॉनिटर करने वाली बात 'DigiDukaan' जैसे B2B प्रोक्योरमेंट नेटवर्क की रियल-वर्ल्ड एडॉप्शन मेट्रिक्स होगी, खासकर मुंबई और दिल्ली जैसे बड़े हब्स में। AI कंप्लायंस पर स्पष्ट रेगुलेटरी गाइडेंस और ओपन-सोर्स इंफ्रास्ट्रक्चर की स्थिरता महत्वपूर्ण कारक होंगे, जो यह निर्धारित करेंगे कि क्या यह वैकल्पिक मॉडल प्राइवेट मार्केटप्लेस के प्रभाव को सफलतापूर्वक कम कर सकता है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.