भारत में काम करने वाली ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) अब भारी-भरकम भर्ती के बजाय AI-संचालित ऑपरेशन्स पर जोर दे रही हैं। कंपनीज अब कर्मचारियों की संख्या बढ़ाने के बजाय उनकी प्रोडक्टिविटी पर फोकस कर रही हैं, जो निवेशकों के लिए एक बड़ा बदलाव है।
भारत में ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) के काम करने के तरीके में बड़ा बदलाव आ रहा है। पहले ये सेंटर बड़े स्तर पर भर्ती करके रिसर्च और सपोर्ट का काम संभालते थे, लेकिन अब वे 'लीन' और 'AI-ऑगमेंटेड' मॉडल की ओर बढ़ रहे हैं। अब कंपनियां पारंपरिक पिरामिड स्ट्रक्चर को छोड़ 'डायमंड मॉडल' अपना रही हैं, जहां 3 से 5 इंजीनियरों की एक छोटी टीम बड़े AI एजेंट्स का इस्तेमाल कर उन कामों को निपटा रही है, जिसके लिए पहले दर्जनों कर्मचारियों की जरूरत पड़ती थी।
प्रोडक्टिविटी है प्राथमिकता
भर्ती तो जारी है, लेकिन डिमांड का नेचर बदल गया है। साल 2026 की पहली छमाही के आंकड़ों के मुताबिक, कुल भर्ती में 12% से 15% की बढ़ोतरी हुई, लेकिन AI-संबंधित स्किल्स की डिमांड में 45% का उछाल देखा गया। कंपनियां अब दोहराव वाले कामों को AI से बदल रही हैं और उन्हें ऐसे प्रोफेशनल्स की तलाश है जिनके पास 3 से 8 साल का अनुभव हो।
IT सेक्टर पर क्या होगा असर?
निवेशकों के लिए सबसे जरूरी यह देखना है कि यह बदलाव टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS), इंफोसिस, विप्रो और HCLTech जैसी बड़ी IT कंपनियों को कैसे प्रभावित करता है। अगर ग्लोबल कंपनियां अपनी अंदरूनी क्षमता (In-house capability) AI के जरिए बढ़ा लेती हैं, तो आउटसोर्सिंग के प्रोजेक्ट्स का वॉल्यूम बदल सकता है।
हालांकि, चुनौतियां अभी बाकी हैं। AI एक्सपर्ट्स की भारी सैलरी और उन्हें रिटेन करने की लागत कंपनी के मार्जिन पर दबाव डाल सकती है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या AI अपनाने से पैरेंट कंपनियों का मुनाफा बढ़ता है या फिर हाई-टेक इंफ्रास्ट्रक्चर का खर्चा मुनाफे को कम कर देता है।
