भारत में मौजूद 2,100 से ज्यादा Global Capability Centres (GCCs) के लिए AI को बड़े पैमाने पर लागू करना चुनौती बन गया है। रिपोर्ट के अनुसार, 70% AI प्रोजेक्ट्स अभी भी पायलट स्टेज पर ही अटके हुए हैं। हालांकि इनका सालाना रेवेन्यू **$98.4 बिलियन** तक पहुंच चुका है, लेकिन तकनीकी बाधाओं और महंगे कंप्यूट कॉस्ट के कारण निवेशकों को मुनाफे की उम्मीद के लिए थोड़ा और इंतजार करना पड़ सकता है।
तकनीकी बाधाओं की चुनौती
भारत में 2,100 से अधिक GCCs हैं, जो 2.36 मिलियन प्रोफेशनल्स को रोजगार दे रहे हैं और $98.4 बिलियन का सालाना रेवेन्यू जनरेट कर रहे हैं। हालांकि, Dell Technologies और Zinnov की हालिया रिपोर्ट बताती है कि AI के क्षेत्र में बड़ी महत्वाकांक्षाओं के बावजूद, ज्यादातर प्रोजेक्ट्स आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। मुख्य समस्या पुरानी (Legacy) इंफ्रास्ट्रक्चर है, जो आधुनिक AI मॉडल्स की जरूरतों को पूरा करने में असमर्थ है। डेटा साइलो (Data Silos) और सुरक्षा ढांचे की कमी के कारण कंपनियां इसे बड़े पैमाने पर लागू नहीं कर पा रही हैं। निवेशकों के लिए यह एक संकेत है कि कंपनियों का कैपिटल एक्सपेंडिचर (CapEx) आने वाले समय में बढ़ सकता है, क्योंकि AI सफलता के लिए IT आर्किटेक्चर को आधुनिक बनाना अनिवार्य है।
बढ़ती लागत और वर्कफोर्स पर असर
अब 'Agentic AI' का दौर आ रहा है, जहाँ AI एजेंट खुद एंड-टू-एंड काम करते हैं। ये वर्कफ्लो काफी ज्यादा कंप्यूट-इंटेंसिव हैं और एक वर्कफ्लो के लिए 5,00,000 टोकन तक की खपत हो रही है, जो कंपनियों के बजट पर दबाव डाल रहा है। साथ ही, GCCs में 55% रूटीन काम पूरी तरह से ऑटोमेट होने की कगार पर हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, 2030 तक 60% वर्कफोर्स को अपनी स्किल्स को पूरी तरह बदलना होगा (Reskilling) ताकि वे इस नए इकोसिस्टम में प्रासंगिक बने रह सकें।
2030 का रोडमैप
अब लीडरशिप का ध्यान प्रोजेक्ट्स की संख्या से हटकर उनके 'Industrialization' पर है। निवेशकों को अब यह देखना होगा कि कंपनियां इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश और ह्यूमन कैपिटल के बीच कैसे तालमेल बैठाती हैं। जो कंपनियां इन तकनीकी बाधाओं को पार कर अपने वर्कफोर्स को तैयार कर लेंगी, लंबे समय में वही कंपनियां ऑपरेशनल एफिशिएंसी और मजबूती के मामले में आगे रहेंगी।
