भारत का इंजीनियरिंग रिसर्च एंड डेवलपमेंट (ER&D) सेक्टर तेजी से आगे बढ़ रहा है। फाइनेंशियल ईयर 2026 में **$63 बिलियन** के अनुमानित स्तर से बढ़कर इसके 2030 तक **$100 बिलियन** से अधिक होने का अनुमान है।
भारत का इंजीनियरिंग रिसर्च एंड डेवलपमेंट (ER&D) सेक्टर अब विकास के एक नए दौर में प्रवेश कर चुका है। ग्लोबल लेवल पर कॉम्प्लेक्स इंजीनियरिंग सॉल्यूशंस की बढ़ती मांग को देखते हुए, अनुमान है कि दशक के अंत तक इस सेक्टर में ग्लोबल स्पेंडिंग $2.5 ट्रिलियन के करीब पहुंच जाएगी।
'Physical AI' का बड़ा रोल
इस ग्रोथ के पीछे सबसे बड़ा ट्रिगर 'Physical AI' है। यह ऐसी तकनीक है जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को रोबोटिक्स, ऑटोनॉमस व्हीकल्स और कनेक्टेड मशीनों जैसे फिजिकल हार्डवेयर के साथ जोड़ती है। पुराने दौर में आउटसोर्सिंग सिर्फ कोडिंग तक सीमित थी, लेकिन अब कंपनियां प्रोडक्ट डिजाइन और जटिल सिस्टम इंटीग्रेशन पर फोकस कर रही हैं।
बदलता बिजनेस मॉडल
L&T Technology Services, Tata Technologies, HCL Technologies, Infosys, और Wipro जैसी बड़ी भारतीय कंपनियां अब अपने पुराने बिजनेस मॉडल को बदल रही हैं। पहले कंपनियां सस्ते लेबर कॉस्ट के मॉडल पर काम करती थीं, लेकिन अब वे 'डिजाइन ओनरशिप' और 'को-क्रिएशन' की ओर बढ़ रही हैं। निवेशकों के लिए यह एक सकारात्मक संकेत है, क्योंकि हाई-वैल्यू इंजीनियरिंग काम से कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन में सुधार की बड़ी संभावना है।
सेक्टर के सामने चुनौतियां
विकास की इस राह में कुछ जोखिम भी हैं। सबसे बड़ी समस्या टैलेंट गैप की है। डोमेन-स्पेसिफिक AI और एम्बेडेड सिस्टम के लिए बेहद कुशल इंजीनियरों की जरूरत है, जिनकी सप्लाई अभी सीमित है। अगर कंपनियां टैलेंट की कमी को दूर नहीं कर पाईं, तो वेज कॉस्ट बढ़ सकती है और डिलीवरी में देरी हो सकती है। इसके अलावा, ग्लोबल इकोनॉमी में सुस्ती, ट्रेड रिस्ट्रिक्शंस और साइबर सिक्योरिटी के खतरे भी सेक्टर के लिए चिंता का विषय बने हुए हैं।
निवेशकों के लिए क्या है अहम?
निवेशकों को अब कंपनियों के उन बड़े डील्स पर नजर रखनी चाहिए जो ऑटोनॉमस और इंटेलिजेंट सिस्टम स्पेस में हो रही हैं। लंबी अवधि में वही कंपनियां बेहतर प्रदर्शन करेंगी, जो लेबर-सेंट्रिक मॉडल से निकलकर हाई-वैल्यू डिजाइन पार्टनरशिप्स में खुद को ढाल सकेंगी।
