भारत के ड्रोन इंडस्ट्री में निवेश का ट्रेंड बदल रहा है। साल 2025 में स्टार्टअप्स ने करीब **$198 मिलियन** की फंडिंग जुटाई, लेकिन अब निवेशक केवल तकनीकी क्षमता नहीं, बल्कि कमर्शियल प्रॉफिटेबिलिटी और कैश फ्लो पर जोर दे रहे हैं।
भारतीय ड्रोन-टेक इंडस्ट्री एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। भले ही साल 2025 में इस सेक्टर में $198 मिलियन का निवेश आया हो, लेकिन अब ग्रोथ-स्टेज की कंपनियों के लिए 'फंडिंग वॉल' खड़ी हो गई है। निवेशक अब उन स्टार्टअप्स को तवज्जो दे रहे हैं जो बड़े पैमाने पर मैन्युफैक्चरिंग करने और सस्टेनेबल मुनाफा कमाने की क्षमता रखते हैं।
डिफेंस कॉन्ट्रैक्ट्स का लिक्विडिटी ट्रैप
कई ड्रोन स्टार्टअप्स के लिए सबसे बड़ी चुनौती सरकारी डिफेंस ऑर्डर्स पर निर्भरता है। ये कॉन्ट्रैक्ट्स साख तो बढ़ाते हैं, लेकिन इनमें पैसा फंसने का डर रहता है। सरकारी पेमेंट और टेक्निकल सर्टिफिकेशन की प्रक्रिया इतनी धीमी होती है कि कभी-कभी कंपनियों का कैश 18 महीने तक इन्वेंट्री में फंसा रहता है। इस 'कैश क्रंच' से बचने के लिए निवेशक अब स्टार्टअप्स को प्राइवेट सेक्टर और एक्सपोर्ट मार्केट की ओर ध्यान देने की सलाह दे रहे हैं।
'Drone-as-a-Service' पर जोर
निवेशकों का भरोसा जीतने के लिए अब कंपनियां हार्डवेयर बेचने के बजाय 'ड्रोन-एज-ए-सर्विस' (DaaS) मॉडल की ओर बढ़ रही हैं। इसमें सॉफ्टवेयर और एनालिटिकल सर्विसेज के जरिए कंपनियों को बार-बार रेवेन्यू मिलता है, जो एक बार में हार्डवेयर बेचने की तुलना में ज्यादा स्थिर माना जाता है।
पब्लिक मार्केट में क्या देख रहे हैं निवेशक?
लिस्टेड कंपनियां जैसे ideaForge, Data Patterns और MTAR Technologies के उदाहरण से साफ है कि मार्केट अब केवल प्रोटोटाइप को नहीं, बल्कि EBITDA मार्जिन और ऑर्डर बुक की मजबूती को देख रहा है। आने वाले समय में वही कंपनियां टिकेंगी जो अपनी वर्किंग कैपिटल को सही ढंग से मैनेज करेंगी और सरकार के अलावा अन्य क्लाइंट्स का बेस तैयार करेंगी। निवेशकों को अब इन कंपनियों के 'कैश कन्वर्जन साइकिल' पर नजर रखने की जरूरत है ताकि पता चल सके कि कौन सी कंपनी कैश बर्न कर रही है और कौन सी बिजनेस बना रही है।
