PwC की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत का डेटा सेंटर सेक्टर 2035 तक **$280 अरब** के बाजार में बदल सकता है। यह वृद्धि क्षमता में आठ गुना बढ़ोतरी होकर **13.8 GW** तक पहुंचने से संभव होगी। AI की वजह से IT इंफ्रास्ट्रक्चर और कूलिंग सिस्टम की मांग बढ़ेगी, लेकिन आयात पर निर्भरता और सप्लाई चेन की स्थिरता जैसे जोखिमों पर निवेशकों को गौर करना होगा।
क्या हुआ है?
कंसल्टिंग फर्म PwC ने अपनी एक नई रिपोर्ट में यह अनुमान लगाया है कि भारत का डेटा सेंटर बाजार 2035 तक $280 अरब के बड़े ऑर्डर बुक तक पहुंच सकता है। इस ग्रोथ का मुख्य कारण आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का तेजी से अपनाया जाना और भारतीय अर्थव्यवस्था में जारी डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन को बताया जा रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस दौरान डेटा सेंटर इंफ्रास्ट्रक्चर में सीधा निवेश लगभग $71.6 अरब तक पहुंचने का अनुमान है, जो इस सेक्टर में बड़े पूंजीगत खर्च (Capital Expenditure) की ओर इशारा करता है।
क्षमता में बड़ा बदलाव
फिलहाल भारत की स्थापित डेटा सेंटर क्षमता लगभग 1.6 गीगावाट (GW) है। अब यह इंडस्ट्री 13.8 GW तक पहुंचने का लक्ष्य रख रही है, जो कि आठ गुना बढ़ोतरी है। यह विस्तार आधुनिक AI वर्कलोड्स की भारी-भरकम पावर और प्रोसेसिंग मांगों को पूरा करने के लिए ज़रूरी है, जिन्हें पारंपरिक एंटरप्राइज एप्लीकेशन्स की तुलना में कहीं ज़्यादा कंप्यूटिंग पावर की ज़रूरत होती है।
कहां जाएगा कैपिटल एक्सपेंडिचर?
इस सेक्टर में कैपिटल एक्सपेंडिचर (Capex) मुख्य रूप से हार्डवेयर और स्पेशलाइज्ड इंफ्रास्ट्रक्चर पर केंद्रित रहेगा। PwC का अनुमान है कि कुल पूंजीगत खर्च का 65% से 75% हिस्सा IT इक्विपमेंट, जैसे हाई-एंड सर्वर, नेटवर्किंग गियर और ज़रूरी चिप्स पर खर्च होगा। अकेले यह सेगमेंट $180 अरब से $210 अरब तक के अवसर पैदा कर सकता है। इसके अलावा, स्पेशलाइज्ड इलेक्ट्रिकल इंफ्रास्ट्रक्चर और एडवांस्ड कूलिंग सिस्टम की ज़रूरत को देखते हुए, संयुक्त ऑर्डर बुक $33 अरब से $46 अरब तक पहुंचने की उम्मीद है।
कूलिंग टेक्नोलॉजी का विकास
AI वर्कलोड्स से अत्यधिक गर्मी पैदा होती है, जिससे पारंपरिक कूलिंग तरीके अप्रभावी हो जाते हैं। यह सेक्टर तेजी से डायरेक्ट लिक्विड-टू-चिप कूलिंग और इमर्शन-आधारित कूलिंग सिस्टम जैसी हाई-परफॉरमेंस टेक्नोलॉजी की ओर बढ़ रहा है। ये टेक्नोलॉजीज हाइपरस्केल और AI-रेडी डेटा सेंटरों के लिए महत्वपूर्ण होती जा रही हैं। निवेशकों के लिए, यह बदलाव यह संकेत देता है कि स्पेशलाइज्ड कूलिंग सिस्टम के सप्लायर्स इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च का बड़ा हिस्सा हासिल कर सकते हैं।
जोखिम और सप्लाई चेन की चिंताएं
इस सकारात्मक अनुमान के बावजूद, डेटा सेंटर सेक्टर को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। एक बड़ा जोखिम मैकेनिकल, इलेक्ट्रिकल और प्लंबिंग (MEP) कंपोनेंट्स के लिए आयात पर भारी निर्भरता है। ये पुर्जे अक्सर 'लॉन्ग-लीड' आइटम्स होते हैं, यानी इन्हें प्राप्त करने में बहुत समय लगता है, जिससे प्रोजेक्ट वैश्विक सप्लाई चेन में बाधाओं और भू-राजनीतिक अस्थिरता के प्रति संवेदनशील हो जाते हैं। इसके अलावा, इंडस्ट्री महत्वपूर्ण आफ्टर-सेल्स सपोर्ट और स्पेयर पार्ट्स के लिए वैश्विक ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर्स (OEMs) पर निर्भर बनी हुई है। सप्लाई चेन में किसी भी देरी से डेटा सेंटर ऑपरेटर्स के लिए प्रोजेक्ट एग्जीक्यूशन में देरी या लागत बढ़ने का खतरा हो सकता है।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
जैसे-जैसे यह सेक्टर विकसित हो रहा है, निवेशकों को कुछ प्रमुख कारकों पर नज़र रखनी चाहिए। पहला, डेटा सेंटर इक्विपमेंट के लिए एक समर्पित प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम जैसी संभावित सरकारी पहलों पर प्रगति देखें, जो आयात पर निर्भरता कम कर सकती है। दूसरा, 'मेक इन इंडिया' पहल के तहत घरेलू विनिर्माण क्लस्टर महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर कंपोनेंट्स का कितनी तेजी से उत्पादन कर पाते हैं, इस पर नज़र रखें। अंत में, प्रमुख हाइपरस्केल प्रोजेक्ट्स के एग्जीक्यूशन टाइमलाइन और कंपनियों की स्थिर, लागत-प्रभावी बिजली सुरक्षित करने की क्षमता पर नज़र रखें, जो इन विशाल सुविधाओं को संचालित करने के लिए एक मुख्य आवश्यकता बनी हुई है।
