भारत का डेटा सेंटर सेक्टर **2030** तक अपनी क्षमता को **3 गुना** बढ़ाकर **5-6 GW** तक ले जाने की तैयारी में है। AI और डेटा लोकलाइजेशन कानूनों के कारण निवेश तो बढ़ रहा है, लेकिन बिजली की किल्लत और कंस्ट्रक्शन में देरी के कारण वास्तविक क्षमता **3 GW** के आसपास सिमट सकती है।
भारत के डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर में एक बड़ा बदलाव आ रहा है। अनुमान है कि देश की इंस्टॉल्ड डेटा सेंटर कैपेसिटी 2030 तक बढ़कर 5 से 6 गीगावाट (GW) हो जाएगी, जो अभी 1.5 से 1.7 GW के आसपास है। इस तेजी के पीछे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), क्लाउड कंप्यूटिंग और डेटा लोकलाइजेशन कानून (जैसे Digital Personal Data Protection Act) मुख्य ड्राइवर हैं।
भारत में निवेश क्यों बढ़ रहा है?
RBI और IRDAI जैसे रेगुलेटर्स के सख्त नियमों के अलावा, भारत अपनी लागत दक्षता (Cost Efficiency) के लिए भी पसंदीदा बना हुआ है। भारत में डेटा सेंटर बनाने की औसत लागत USD 8 मिलियन प्रति मेगावाट है, जो वैश्विक बाजारों की तुलना में काफी कम है। यही कारण है कि बड़ी घरेलू कंपनियां और ग्लोबल हाइपरस्केलर्स इस क्षेत्र में भारी निवेश कर रहे हैं।
लक्ष्य बनाम हकीकत
हालांकि इंडस्ट्री का सार्वजनिक लक्ष्य 5-6 GW है, लेकिन Axis Capital जैसे ब्रोकरेज फर्मों का मानना है कि 2030 तक वास्तविक क्षमता 2.8 से 3.6 GW तक ही सीमित रह सकती है। इसकी सबसे बड़ी वजह बिजली की भारी मांग है। एक 6 GW के नेटवर्क को चलाने के लिए ग्रिड को 7 से 9 GW बिजली की आपूर्ति करनी होगी, जिसे हासिल करना एक बड़ी चुनौती है। इसके अलावा, एक डेटा सेंटर को तैयार होने में 32 से 36 महीने का समय लग जाता है, जिससे प्रोजेक्ट्स के पूरा होने में देरी हो रही है।
नई जगहों पर बढ़ता फोकस
मुंबई और चेन्नई फिलहाल डेटा सेंटर हब बने हुए हैं, लेकिन अब कंपनियां हैदराबाद, गुजरात और राजस्थान की ओर रुख कर रही हैं। इन राज्यों में जमीन और बिजली की उपलब्धता बेहतर है, जो AI-आधारित पावर-हंग्री यूनिट्स के लिए जरूरी है।
निवेशकों को क्या ट्रैक करना चाहिए?
इस सेक्टर में Adani Group और Reliance Industries जैसे दिग्गज बड़े खिलाड़ी हैं। निवेशकों को अब केवल घोषणाओं पर नहीं, बल्कि प्रोजेक्ट्स के असल कमीशनिंग डेट्स और कंपनियों की बिजली सुनिश्चित करने की क्षमता पर नजर रखनी चाहिए।
