भारत में AI और डिजिटल क्रांति के चलते Data Center का जाल तेजी से बिछ रहा है, लेकिन जल संकट अब एक बड़ी चुनौती बनकर उभर रहा है। अधिकांश सेंटर पानी की कमी वाले इलाकों में हैं, जिससे भविष्य में रेगुलेटरी नियमों और बढ़ती लागत का दबाव बढ़ सकता है।
भारत का डिजिटल हब बनने का सपना डेटा सेंटर्स की तेजी से जुड़ी हुई है। क्लाउड और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की बढ़ती मांग के बीच ये सेंटर देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन चुके हैं। लेकिन सर्वर को ठंडा रखने के लिए इस्तेमाल होने वाली 'इवेपरेटिव कूलिंग' तकनीक अब बड़ी मुसीबत बन रही है।\n\n### पानी की भारी खपत और चुनौतियां\n\nआंकड़े चौंकाने वाले हैं—एक 100-मेगावाट का डेटा सेंटर रोजाना 20 लाख लीटर पानी तक खर्च कर सकता है। स्थिति यह है कि भारत के 60% से 80% मौजूदा और प्रस्तावित डेटा सेंटर ऐसे इलाकों में स्थित हैं, जहाँ पानी की भारी कमी (Water Stress) है। मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद और चेन्नई जैसे प्रमुख हब इस संकट के केंद्र में हैं।\n\n### रेगुलेटरी रिस्क और निवेशकों की चिंता\n\nफिलहाल, डेटा सेंटर्स को सामान्य निर्माण प्रोजेक्ट्स के तहत क्लीयरेंस मिल जाता है, जिससे उन्हें कठिन औद्योगिक नियमों से राहत मिली हुई है। लेकिन जानकारों का मानना है कि पानी की बर्बादी को देखते हुए सरकार जल्द ही कड़े नियम ला सकती है।\n\nReliance Industries और Adani (AdaniConneX) जैसी दिग्गज कंपनियों के लिए यह एक बहुस्तरीय रिस्क है। यदि सरकार पानी के इस्तेमाल पर सीमा लगाती है या अलग से पर्यावरण क्लीयरेंस अनिवार्य करती है, तो प्रोजेक्ट की लागत और समय दोनों बढ़ जाएंगे।\n\n### क्या है समाधान?\n\nकंपनियों को अब 'क्लोज्ड-लूप' या 'सी-वॉटर कूलिंग' जैसी महंगी तकनीकों की तरफ जाना होगा। हालांकि, इससे कंपनियों का कैपिटल एक्सपेंडिचर (CAPEX) बढ़ेगा और मुनाफे पर असर पड़ सकता है। निवेशकों के लिए सलाह है कि वे कंपनियों की सालाना रिपोर्ट्स में उनके 'वॉटर मैनेजमेंट' पर नजर रखें, क्योंकि भविष्य में यह उनके स्टॉक के परफॉर्मेंस का एक बड़ा पैमाना साबित हो सकता है।
