भारत सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग में वैश्विक खिलाड़ी बनने की राह पर है, लेकिन एक्सपर्ट्स के मुताबिक, कुशल कर्मचारियों की कमी और आयातित उपकरणों पर निर्भरता जैसी बड़ी चुनौतियां सामने हैं।
भारत की सेमीकंडक्टर रणनीति: उम्मीदें और हकीकत
भारत ने सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग में एक वैश्विक शक्ति बनने का लक्ष्य रखा है। इस रणनीति में ताइवान, दक्षिण कोरिया, मलेशिया और सिंगापुर जैसे देशों के सफल मॉडलों को अपनाया जा रहा है। ताजा इंडस्ट्री एनालिसिस के मुताबिक, देश 28nm से 110nm जैसे मैच्योर नोड्स पर फोकस कर रहा है। ये नोड्स ऑटोमोटिव, इंडस्ट्रियल और कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे सेक्टर के लिए बेहद ज़रूरी हैं, जिनके दम पर 2031 तक देश में चिप की खपत $155 अरब से ज़्यादा होने का अनुमान है।
टैलेंट और सप्लाई चेन की बड़ी चुनौतियां
जहां भारत में चिप डिजाइनर्स की बड़ी फौज (3 लाख के करीब) मौजूद है, वहीं मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में स्थिति अलग है। खासतौर पर यील्ड इंजीनियरिंग, क्लीनरूम मैनेजमेंट, मेट्रोलॉजी और प्रोसेस इंजीनियरिंग जैसे कामों के लिए खास तौर पर प्रशिक्षित तकनीकी प्रोफेशनल्स की भारी कमी है। इस गैप को पाटना प्रोडक्शन एफिशिएंसी बनाए रखने के लिए बहुत ज़रूरी है। सरकार का लक्ष्य 2027 तक 85,000 इंडस्ट्री-रेडी इंजीनियर्स तैयार करना है। सैनंद में माइक्रोन फैसिलिटी का सफल ऑपरेशन, जहां 2,000 वर्कर्स को ट्रेन किया गया, भविष्य की बड़ी परियोजनाओं के लिए एक मॉडल पेश करता है।
टैलेंट के अलावा, देश की डोमेस्टिक सप्लाई चेन अभी शुरुआती दौर में है। सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग के लिए ज़रूरी 90% से ज़्यादा उपकरण अभी भी इंपोर्ट किए जाते हैं। इतना ही नहीं, इलेक्ट्रॉनिक-ग्रेड गैसों और स्पेशियलिटी केमिकल्स के लिए भी इंडस्ट्री बाहरी सप्लायर्स पर बहुत ज़्यादा निर्भर है, जिनमें से 85% से 90% तक मटेरियल विदेश से आने की उम्मीद है। आयात पर यह भारी निर्भरता लॉजिस्टिक्स के लिहाज़ से एक बड़ी कमजोरी है और मैन्युफैक्चरर्स को ग्लोबल प्राइस फ्लक्चुएशन्स और सप्लाई चेन में आने वाले व्यवधानों के प्रति संवेदनशील बनाती है।
मैच्योर नोड्स और परियोजनाओं पर फोकस
धोलेरा फैब्रिकेशन फैसिलिटी इस पहल का एक अहम हिस्सा है, जिसका लक्ष्य 28nm प्रोडक्शन करना है। हालांकि यह एक बड़ा कदम है, लेकिन इसे अभी भी मैच्योर-नोड प्रोजेक्ट ही माना जा रहा है। लंबी अवधि की कॉम्पिटिटिवनेस के लिए, इंडस्ट्री को आखिरकार ज़्यादा एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग नोड्स की ओर बढ़ना होगा। मौजूदा पॉलिसी फ्रेमवर्क इंसेंटिव्स के ज़रिए इन गैप्स को भरने की कोशिश कर रहा है, लेकिन इन प्रोजेक्ट्स की सस्टेनेबिलिटी काफी हद तक अपस्ट्रीम रॉ मैटेरियल्स और हाई-एंड इक्विपमेंट के लिए एक इकोसिस्टम बनाने पर निर्भर करेगी।
स्टेकहोल्डर्स के लिए अगला अहम कदम लोकल सप्लाई चेन डेवलपमेंट की टाइमलाइन पर नज़र रखना होगा। इन्वेस्टर्स को यह देखना होगा कि ये फैसिलिटीज कितनी प्रभावी ढंग से लगातार रॉ मैटेरियल सप्लाई सुनिश्चित कर पाती हैं और क्या प्लान किए गए ट्रेनिंग प्रोग्राम्स ग्लोबल सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरर्स की हाई टेक्निकल रिक्वायरमेंट्स को पूरा कर पाते हैं। इन पहलों की असल कामयाबी कैपिटल स्पेंडिंग को वर्कफोर्स की तैयारी की रफ़्तार और बाहरी सप्लायर्स पर निर्भरता कम करने की क्षमता के साथ बैलेंस करने पर टिकी होगी।
