साल 2026 तक भारत में AI प्रोफेशनल्स की भारी किल्लत होने वाली है। मांग और सप्लाई के बीच **3.5 गुना** का अंतर कंपनियों के वेतन खर्च को बढ़ा रहा है, जिसका सीधा असर उनके ऑपरेटिंग मार्जिन पर पड़ सकता है।
भारत में आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस (AI) की दौड़ तो तेज है, लेकिन इसके साथ ही लेबर मार्केट में एक बड़ा गैप भी उभर कर सामने आया है। अनुमान के मुताबिक, साल 2026 तक देश को 14 लाख स्किल्ड AI प्रोफेशनल्स की जरूरत होगी, जबकि उपलब्ध टैलेंट पूल मात्र 4 लाख के आसपास रहने का अनुमान है। यह सप्लाई-डिमांड का असंतुलन बड़ी टेक कंपनियों की वित्तीय सेहत के लिए चुनौती बनता जा रहा है।
मार्जिन पर दबाव और सैलरी का गणित
निवेशकों के लिए सबसे बड़ी चिंता कंपनी की बैलेंस शीट है। IT सेक्टर में कर्मचारियों का वेतन सबसे बड़ा खर्च होता है। टैलेंट की मारामारी के कारण कंपनियों को अब स्किल-बेस्ड सैलरी मॉडल अपनाना पड़ रहा है, जहां मशीन लर्निंग जैसे हाई-डिमांड रोल्स के लिए वेतन सामान्य रोल से 3 गुना ज्यादा तक हो सकता है। अगर कंपनियां अपनी लागत ग्राहकों पर नहीं डाल पाईं, तो उनके प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव आना तय है।
कंपनियों का रिस्क मिटिगेशन प्लान
Tata Consultancy Services, Infosys, Wipro और HCLTech जैसी बड़ी कंपनियां इस रिस्क को कम करने के लिए बड़े पैमाने पर इन-हाउस री-स्किलिंग प्रोग्राम चला रही हैं। कंपनियों का फोकस बाहर से हायरिंग करने के बजाय अपने मौजूदा स्टाफ को जेनरेटिव AI और सिस्टम इंटीग्रेशन में ट्रेन करने पर है। हालांकि, इन कार्यक्रमों में किया गया भारी निवेश शॉर्ट टर्म में कंपनी के मुनाफे को कम कर सकता है।
निवेशकों के लिए जरूरी संकेत
भविष्य में सिर्फ रेवेन्यू ग्रोथ देखना काफी नहीं होगा। निवेशकों को अब तिमाही नतीजों में ऑपरेटिंग मार्जिन, एट्रिशन रेट (कर्मचारियों के छोड़ने की दर) और ट्रेनिंग पर होने वाले खर्च पर बारीकी से नजर रखनी चाहिए। जो कंपनियां बढ़ते वेतन बिल के बावजूद अपनी AI क्षमताओं को कुशलता से बढ़ाएंगी, वही लंबे समय में बाजार में अपनी बढ़त कायम रख सकेंगी।
