भारत में AI डेटा सेंटर प्रोजेक्ट्स को लेकर बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। ठाणे और विशाखापत्तनम जैसे शहरों में भारी बिजली और पानी की खपत के कारण स्थानीय लोग विरोध कर रहे हैं, जिससे इन प्रोजेक्ट्स की टाइमलाइन पर खतरा मंडराने लगा है।
भारत का आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) हब बनने का सपना अब जमीनी हकीकत की चुनौतियों से जूझ रहा है। डेटा सेंटर एक हाई-कैपेक्स (High-CAPEX) बिजनेस है, जिसे चलाने के लिए भारी मात्रा में बिजली और पानी की जरूरत होती है। ठाणे और विशाखापत्तनम जैसे औद्योगिक हब में स्थानीय लोग इन संसाधनों की कमी के चलते इन बड़े प्रोजेक्ट्स का पुरजोर विरोध कर रहे हैं।
निवेशकों के लिए क्यों है चिंता का विषय?
निवेशकों की मुख्य चिंता 'एग्जीक्यूशन रिस्क' (Execution Risk) को लेकर है। यदि किसी प्रोजेक्ट में स्थानीय लोग विरोध प्रदर्शन या कानूनी पचड़े पैदा करते हैं, तो डेटा सेंटर के चालू होने में देरी होती है। इससे कंपनी की कैपिटल एफिशिएंसी प्रभावित होती है और मुनाफे पर असर पड़ता है। एक 100 MW की सुविधा को चालू रखने के लिए हर दिन भारी मात्रा में संसाधन खर्च होते हैं, जो अक्सर स्थानीय आबादी के उपयोग के लिए भी जरूरी होते हैं।
सरकारी नीति का अभाव
इस सेक्टर में सबसे बड़ी मुश्किल एक स्पष्ट नेशनल पॉलिसी का न होना है। साल 2020 की 'ड्राफ्ट नेशनल डेटा सेंटर पॉलिसी' अभी तक नोटिफाई नहीं हुई है। इस 'रेगुलेटरी वैक्यूम' के कारण राज्य सरकारें अपने हिसाब से फैसले ले रही हैं, जिससे पारदर्शिता और अप्रूवल प्रोसेस में असमानता बनी हुई है।
ESG रिस्क और आगे की राह
स्थानीय स्तर पर बिजली और पानी की प्राथमिकता को लेकर हो रहे विवादों ने कंपनियों के लिए ESG (Environmental, Social, and Governance) रिस्क बढ़ा दिया है। ESDS Software Solutions जैसी कंपनियों ने भी पहले अपने डिस्क्लोजर में इस तरह के विरोध को एक मैटेरियल रिस्क के तौर पर चिन्हित किया है।
आने वाले समय में निवेशकों को यह देखना होगा कि कंपनियां इन चुनौतियों से कैसे निपटती हैं। भारत का 2030 तक 6.5 GW क्षमता हासिल करने का लक्ष्य तभी पूरा हो सकता है, जब सरकार जल्द से जल्द एक स्पष्ट नीति लाए और कंपनियां स्थानीय समुदायों के साथ बेहतर सामंजस्य बिठाएं।
