AI Data Centre Boom: भारत में डेटा सेंटर्स का तेजी से विस्तार, क्या बढ़ती बिजली और पानी की मांग बनेगी बाधा?

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AuthorAditya Rao|Published at:
AI Data Centre Boom: भारत में डेटा सेंटर्स का तेजी से विस्तार, क्या बढ़ती बिजली और पानी की मांग बनेगी बाधा?

भारत में AI-ड्रिवन डेटा सेंटर्स का तेजी से विस्तार हो रहा है और 2030 तक इनकी क्षमता कई गुना बढ़ने का अनुमान है। हालांकि, भारी बिजली और पानी की खपत के चलते निवेशकों को अब बड़े निवेश के साथ-साथ रिसोर्स स्कर्सिटी और पॉलिसी रिस्क पर भी नजर रखनी होगी।

भारत का इंफ्रास्ट्रक्चर एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। ग्लोबल टेक कंपनियां और लोकल ऑपरेटर्स भारत में तेजी से AI-रेडी डेटा सेंटर्स तैयार कर रहे हैं। प्रोजेक्शन के मुताबिक, डेटा सेंटर की क्षमता 2026 में 1.5 गीगावाट (GW) से बढ़कर 2030 तक 6.5 GW तक पहुंचने की उम्मीद है। निवेश को आकर्षित करने के लिए उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्य कंपनियों को जमीन, बिजली सब्सिडी और टैक्स बेनिफिट्स जैसे आकर्षक पैकेज दे रहे हैं।

रिसोर्स और इंफ्रास्ट्रक्चर की चुनौती

इस विस्तार की सबसे बड़ी चुनौती भारी-भरकम यूटिलिटी कंजम्पशन है। AI वर्कलोड साधारण डेटा स्टोरेज के मुकाबले काफी ज्यादा एनर्जी की खपत करते हैं। मिनिस्ट्री ऑफ पावर के अनुमान के मुताबिक, 2031-32 तक ये फैसिलिटीज 26.3 GW का एडिशनल इलेक्ट्रिसिटी लोड बढ़ाएंगी, जो भारत की कुल पीक इलेक्ट्रिसिटी डिमांड का लगभग 7% है।

बिजली के अलावा, डेटा सेंटर्स की कूलिंग के लिए पानी की भारी खपत भी एक बड़ी समस्या बन रही है। ठाणे और विशाखापत्तनम जैसे इलाकों में डेटा सेंटर्स और स्थानीय खेती/आवासीय जरूरतों के बीच पानी को लेकर प्रतिस्पर्धा देखी जा रही है। यदि भविष्य में पर्यावरणीय दबाव बढ़ा, तो कंपनियों को पानी रीसाइक्लिंग पर अतिरिक्त खर्च करना पड़ सकता है, जिसका सीधा असर उनके प्रॉफिट मार्जिन और प्रोजेक्ट टाइमलाइन पर पड़ेगा।

आर्थिक वास्तविकता और इंपोर्ट पर निर्भरता

निवेश के बड़े आंकड़े जरूर आकर्षक दिखते हैं, लेकिन भारत के लिए इसके आर्थिक फायदे उतने सीधे नहीं हैं। AI क्रांति को चलाने वाले हार्डवेयर, जैसे कि एडवांस्ड GPUs, हाई-एंड सर्वर्स और नेटवर्किंग इक्विपमेंट के लिए भारत पूरी तरह से इम्पोर्ट पर निर्भर है। चूंकि देश में इन कोर टेक्नोलॉजी का मैन्युफैक्चरिंग बेस कम है, इसलिए ज्यादातर मुनाफा विदेशी सप्लायर्स के पास ही जा रहा है।

रेगुलेटरी और फ्यूचर आउटलुक

यूनियन बजट 2026-27 में विदेशी क्लाउड प्रोवाइडर्स के लिए 2047 तक टैक्स हॉलिडे की घोषणा की गई है, जो इस सेक्टर के लिए एक बड़ा बूस्ट है। हालांकि, देश में अभी भी कोई एक नेशनल डेटा सेंटर पॉलिसी नहीं है, जिससे मल्टी-स्टेट ऑपरेशंस में रेगुलेटरी अनिश्चितता बनी रहती है।

निवेशकों को अब इस बात पर नजर रखनी चाहिए कि क्या सरकार भविष्य में इंसेंटिव्स को लोकल मैन्युफैक्चरिंग से जोड़ती है। फिलहाल, पावर ग्रिड की विश्वसनीयता, पानी की उपलब्धता और सस्टेनेबिलिटी से जुड़े सख्त नियम इस सेक्टर के भविष्य को तय करने वाले प्रमुख फैक्टर्स होंगे।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.