Indian Workers Train Robots: कहीं नौकरी छिनने का डर तो नहीं?

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
Indian Workers Train Robots: कहीं नौकरी छिनने का डर तो नहीं?
Overview

भारत के टेक्सटाइल फैक्ट्री के मजदूर अब AI और रोबोट्स को ट्रेन करने के लिए अपने हर काम को रिकॉर्ड कर रहे हैं। 'एगोसेंट्रिक डेटा' कलेक्शन के इस तरीके से नौकरी जाने का डर वाजिब हो रहा है, क्योंकि कंपनियां इंसानी हुनर और मसल मेमोरी को ऑटोमेशन के लिए हासिल कर रही हैं।

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ऑटोमेशन की ट्रेनिंग का अनोखा विरोधाभास

भारत के टेक्सटाइल इंडस्ट्री में काम करने वाले मजदूर अनजाने में अपनी ही छंटनी की तैयारी कर रहे हैं। वे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और रोबोटिक सिस्टम को सिखाने के लिए अपने हर मूवमेंट और स्किल को बारीकी से रिकॉर्ड कर रहे हैं। इस 'एगोसेंट्रिक डेटा' कलेक्शन में लोग सिर पर कैमरे लगाकर अपने काम को फर्स्ट-पर्सन व्यू से कैप्चर करते हैं। इस डेटा का इस्तेमाल मशीनों को ऐसे स्किल सिखाने के लिए किया जाता है, जिससे वे बदलते माहौल में ढल सकें। यह इंसानी हुनर मशीनों को सिखाने का तरीका AI डेवलपमेंट के लिए बहुत ज़रूरी है, लेकिन इससे मजदूरों में घबराहट साफ दिख रही है। एक टेक्नीशियन ने कहा, "यह ऐसा है जैसे आप अपनी कब्र खुद खोद रहे हों, और उसे खुद ही बना रहे हों।"

'एम्बोडीड इंटेलिजेंस' की बढ़ती मांग

एडवांस्ड, इंसानों जैसी AI बनाने के लिए भारी मात्रा में डेटा की ज़रूरत होती है – करीब 10 करोड़ से 100 करोड़ घंटे तक के इंसानी एक्टिविटी रिकॉर्डिंग की। फैक्ट्रियों में रोबोट सालों से तय काम करते आ रहे हैं, लेकिन AI की नई पीढ़ी को डायनामिक और अप्रत्याशित माहौल में काम करने की क्षमता चाहिए। इस "फिजिकल इंटेलिजेंस" को इंसानी व्यवहार के डेटा से हासिल करना बहुत अहम है। हालांकि, डेटा कलेक्शन की इस प्रक्रिया में अक्सर शक्ति असंतुलन (power imbalance) देखने को मिलता है, क्योंकि मजदूरों को अक्सर यह नहीं पता होता कि उनके रिकॉर्ड किए गए हुनर का अंतिम उपयोग कहाँ और कैसे होगा। यह इंसानी मेहनत और हुनर के कमोडिफिकेशन (commodification) को लेकर नैतिक सवाल खड़े करता है।

डेटा देने वाले देशों का ग्लोबल नेटवर्क

US-आधारित कंपनी Objectways, जो AI डेटा सॉल्यूशंस में माहिर है, इस डेटा अधिग्रहण में सबसे आगे है। यह कंपनी भारत और दूसरे देशों में लोगों को काम पर रख रही है ताकि वे फैक्ट्री फ्लोर के बारीक कामों से लेकर खाना बनाने और कपड़े तह करने जैसे रोज़मर्रा के घरेलू कामों तक को रिकॉर्ड कर सकें। भारत इस खास डेटा का एक प्रमुख स्रोत बनकर उभरा है। यहां मजदूरों को उनके काम के लिए हर घंटे ₹250 से ₹350 तक का भुगतान किया जाता है, जिसमें अक्सर मोबाइल ऐप के जरिए घर से रिकॉर्डिंग की सुविधा मिलती है। मांग बहुत ज़्यादा है, एक फर्म Humyn Labs ने तो ग्लोबल डेटा कलेक्शन पहलों के लिए $20 मिलियन का फंड भी दिया है।

वाजिब चिंताएं और दूसरा नजरिया

इस सेक्टर के एग्जीक्यूटिव्स (Executives) यह मानते हैं कि मजदूरों की नौकरी जाने की चिंताएं जायज़ हैं। हालांकि, एक दूसरा नजरिया यह भी है कि रोबोट खतरनाक या अरुचिकर काम कर सकते हैं, जिससे इंसानों को ज़्यादा संतुष्टिदायक या कम जोखिम वाली नौकरियों में जाने का मौका मिल सकता है। इस उम्मीद भरे नजरिए के बावजूद, कई मजदूरों के लिए हकीकत अनिश्चितता भरी है। उन्हें डर है कि उनके रिकॉर्ड किए गए कामों का इस्तेमाल ऐसे सिस्टम बनाने में होगा जो आखिरकार उनकी जगह ले लेंगे। इस तरह के निजी डेटा का कलेक्शन यह डरावनी संभावना पैदा करता है कि "आखिरकार मशीन जान जाएगी कि मैं कौन हूँ।"

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.